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शास्त्री पार्क हादसा : अंधेरे और धुएं में फंसकर जान गंवा बैठे लोग, पीड़ितों की पहचान में आई दिक्कत

Sat, 01 Apr 2023 04:08 AM IST
दुष्यंत शर्मा आदित्य पाण्डेय/राजीव कुमार, नई दिल्ली

सार

छोटे-छोटे कमरों में भरे दमघोंटू धुएं और अंधेरे के कारण लोग फंस गए। जैसे-तैसे कुछ लोग बाहर निकल आए, लेकिन छह लोग जान नहीं बचा पाए।
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विस्तार
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पूर्वी दिल्ली के शास्त्री पार्क इलाके में घर में मच्छर भगाने की क्वाइल जलाकर सोए छह लोगों की दम घुटने से मौत के बाद इलाके में दहशत है। छोटे-छोटे कमरों में भरे दमघोंटू धुएं और अंधेरे के कारण लोग फंस गए। जैसे-तैसे कुछ लोग बाहर निकल आए, लेकिन छह लोग जान नहीं बचा पाए। हसमत और नाजमीन भी अपने चार में से तीन बच्चों को ही निकाल पाए। जब ढाई साल के बेटे हमजा की मौत की जानकारी नाजमीन को मिली तो वह बेसुध हो गई। वह बस एक ही बात बार-बार बोल रही थी कि ‘हाय मेरा हमजा।’ 
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पड़ोस की महिलाएं उसे किसी तरह संभालने को कोशिश कर रही थीं। महिलाएं उसे धूप से हटकर छांव में बैठने के लिए कहती रहीं, लेकिन नाजमीन दीवार की टेक लिए बेसुध पड़ी रही। बच्चे कभी उससे लिपटते तो कभी लोगों को देखतेे। पहली मंजिल पर परिवार ने सुबह चार बजे उठकर एक साथ सहरी की थी और सो गए थे। करीब 8 बजे भूतल से चीख सुनकर जागे तो कमरा धुएं से भरा था। बिजली भी गुल थी। अंधेरे और धुएं के कारण कमरे में कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। नाजमीन और पति हसमत जान बचाकर तीन बच्चों को किसी तरह घर से बाहर निकाल लाए। 

आग इतनी भयावह थी कि घर के खिड़की, दरवाजों से धुएं का गुबार निकल रहा था। हसमत बेटे हमजा को बचाने केे लिए दोबारा घर में जाना चाहते थे, लेकिन लोगों ने उन्हें पकड़ लिया। हसमत चिल्लाते रहे कि हमजा नहीं मिला, वो अंदर जा रहे हैं। लोगों ने किसी तरह उन्हें काबू किया और समझाया कि यदि अंदर गए तो जिंदा वापस नहीं लौटोगे। 
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हसमत बेटी माहिरा (6), बेटे फरहान (4), बेेटी सोनी (15) और पत्नी को चादर में लपेटकर सीढ़ियों से किसी तरह नीचे आए। इस बीच उनके हाथ, सर के बाल और चेहरा झुलस गया। उनका साथ देने में सोनी भी लपटों की चपेट में आ गई। सोनी और हसमत को अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

ड्यूटी जाने के लिए जाग रहे थे इसलिए बच गए
मुतिउर रहमान ड्यूटी पर जाने के लिए सुबह जग गए थे, इसलिए बच गए, लेकिन उनके साथ कमरे में सो रहे जहीदुल और फजलू चौधरी नहीं बच पाए। तीनों तीसरी मंजिल पर एक साल से कमरा किराए पर लेकर रह रहे थे। वहीं, स्थानीय लोगों का कहना है कि ऊपरी मंजिल पर दर्जनभर लोग एक ही कमरे में रहते थे। अधिकतर लोग सुबह काम पर चले गए थे। रहमान पश्चिम बंगाल के मालदा टाउन से आकर यहां बैटरी रिक्शा चलाते हैं। 

उनके साथी भी कोई बैटरी रिक्शा तो कोई पैर से चलाने वाला रिक्शा चलाकर गुजारा करते हैं। रहमान ने बताया कि जब आग लगी तो सभी गहरी नींद में सो रहे थे। उनका ड्यूटी पर जाने का समय हो गया था, इसलिए वो अचानक जग गए। कमरे में धुंआ भर गया है, कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था और दम घुट रहा था। चिल्लाकर बाकी साथियों को जगाया। उनके पीछे ताजूदास बचकर भागे, लेकिन जहीदुल और फजलू नहीं निकल पाए। आग बुझने के बाद पुलिस ने उनका शव अंदर से निकाला।

आग से ज्यादा खतरनाक है धुआं
डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. पुलिन गुप्ता ने बताया कि आग से ज्यादा खतरनाक धुआं है। ये सीधे लंग्स तक पहुंच जाता है जो शरीर में ऑक्सीजन की कमी कर देता है। इससे व्यक्ति बेहोश व कमजोर हो जाता है। धुएं के साथ कार्बन मोनोऑक्साइड शरीर में पहुंचकर सोचने-समझने की शक्ति को खत्म कर देती है। ब्रेन प्रभावित होने से शरीर भी बचाव के लिए कुछ नहीं कर पाता। 

यह ऐसी गैस है जो मनुष्यों और जानवरों के लिए विषाक्त है। अगर कार्बन मोनोऑक्साइड सांस के साथ शरीर में चली गए तो शरीर पीला पड़ जाता है। इससे पीड़ित व्यक्ति की कुछ देर में मौत भी हो सकती है। इसके अलावा चक्कर आने के साथ कमजोरी महसूस होने लगती है। कोमा की अवस्था में श्वसन अंगों के फेल हो जाने से मौत हो जाती है।

कम आमदनी, दमघोंटू कमरे में रहने को मजबूर
शास्त्री पार्क मेंं कम आमदनी की वजह से किरायेदार दमघोंटू कमरे में रहने को विवश हैं। यहां  करीब पंद्रह सौ रुपये में   आसानी से कमरा मिल जाता है। इसमें भी कई लोग एक साथ रह लेते हैं। 

मुतिउर रहमान ने बताया कि वह पश्चिम बंगाल का निवासी है और यहां बैटरी रिक्शा चलाता है। सुबह आठ बजे ही काम पर जाने के बाद देर रात कमरे में आकर सो जाता है। ऐसे में किरायेदारों को लेकर मकान मालिक को भी किसी तरह की कोई समस्या नहीं होती। मकान मालिक ने उसका सत्यापन भी नहीं करवाया है।
वहीं, ताजुदास ने बताया कि वह भी पश्चिम बंगाल का रहने वाला है और दोस्तों के साथ इसी इलाके में 1500 रुपये में कमरा किराये पर लेकर रहता है। किराया सभी लोग बांटते हैं जिससे उसके हिस्से में कम पैसा आता है। 

सफीक ने बताया कि वह एक फैक्टरी में काम करता है और उसे दस हजार रुपये वेतन मिलता है। ऐसे में वह साथियों के साथ किराये पर रहता है। इससे उसे पैसों की बचत होती है। यहां ज्यादातर मजदूरी करने वाले ही दोस्तों के साथ किराये पर कमरा लेकर रहते हैं। दिनभर काम करने के बाद रात में ही अपने कमरे में आते हैं। इससे मकान मालिक को भी उन जैसे लोगों को कमरा किराये पर देने में कोई दिक्कत नहीं होती। 

नहीं था पुलिस सत्यापन, पीड़ितों की पहचान करने में आई दिक्कत
किरायेदारों का पुलिस सत्यापन आपराधिक वारदातों को रोकने के लिए होता है। इससे पता लग जाता है कि किरायेदार आपराधिक प्रवृति या फिर आतंकी तो नहीं है, लेकिन शास्त्री पार्क में दर्दनाक हादसे में जान गंवाने वाले पीड़ितों का पुलिस सत्यापन होता तो उनकी पहचान जल्दी हो जाती। 

दरअसल, हादसे के बाद ज्योति नगर थाना पुलिस को पीड़ितों की पहचान करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। पहचान सिर्फ नामों से हुई। ये पता नहीं चल पाया की पीड़ित कहां के मूल निवासी हैं। पुलिस अब इस इलाके में शिविर लगाकर सभी किरायेदारों का सत्यापन कराएगी।

सत्यापन के बाद किरायेदार की पूरी जानकारी कानून प्रवर्तन के पास जमा हो जाती है। सत्यापन की जिम्मेदारी मकान मालिक के साथ-साथ पुलिस की भी होती है। पुलिस की वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन और स्थानीय थानों में जाकर ऑफलाइन पुलिस सत्यापन कराया जा सकता है। शास्त्री पार्क की मजार वाली गली में छोटे-छोटे मकानों में काफी लोग रहते हैं। एक मकान में 30 से 40 लोग रहते हैं। 

उत्तर-पूर्व जिले के एक अधिकारी ने बताया कि पुलिस सत्यापन तो दूर यहां पर किसी स्थानीय निकाय व लोगों को पता नहीं है कि मजार वाली गली में कितने लोग रहते हैं। ये लोग कहां के रहने वाले हैं और क्या काम करते हैं। अगर पीड़ित का पुलिस सत्यापन होता तो पीड़ितों की तुरंत पहचान हो जाती और परिवारों को सूचना दी जाती। पुलिस पीड़ितों के कागजात चेक करवा रही है। हालांकि, ज्यादातर कागजात जल गए हैं। 
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