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दंगों का दर्दः 'अपनों' के बीच बेगाना कर गए बाहर से आए दंगाई, अब तक नहीं मिले दिल

Sat, 20 Feb 2021 05:09 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
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delhi violence - फोटो : अमर उजाला
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दिल्ली दंगों के सभी गुनहगार बेशक अभी तक सलाखों के पीछे नहीं सके हैं, लेकिन आम लोगों का एक नजरिया यह भी है कि दंगों में बाहरी शामिल थे। इन लोगों को उत्तर-पूर्वी दिल्ली के सामाजिक ताने-बाने को इस कदर रौंदा कि उसकी पहचान आज भी लौट नहीं पाई है। दिल्ली के इतिहास को दागदार करने वाली दिल्ली हिंसा के निशान अभी बाकी हैं। दोनों समुदायों में तीज-त्योहार से लेकर दुआ-सलामती तक की रवायतों में लकीरें खिंची हुई हैं। दंगा प्रभावित इलाकों से गुजरने पर अजीब सा तनाव महसूस भी किया जा सकता है। अमर उजाला संवाददाता अभिषेक पांचाल और किशन कुमार की रिपोर्ट...

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इमारतों से लेकर दिलों में बाकी है दंगे के निशान
दंगों से पहले संजय कौशिक और मेहताब कमर बमुश्किल 200 मीटर की दूरी पर रहते थे। बृजपुरी में दोनों का अपना घर है। घर पास-पास होने से रोजाना की खैर-मकदम के साथ एक-दूसरे के तीज-त्योहार में भी भागीदारी रहती थी। दिल्ली दंगा दोनों पर कहर बनकर टूटा। दंगाइयों के घर जलाने से बेघर दोनों हुए थे। खैरियत इतनी भर रही कि दोनों परिवारों ने अपनों को नहीं खोया था। छत से कूदकर भागने पर जान बच गई थी। अब साल भर बीतने को हैं, अभी तक दोनों परिवारों की गृहस्थी पूरी तरह जम नहीं पाई है। अलग-अलग समुदाय के दो परिवार की दर्दनाक कहानी यहां तक एक जैसी है। लेकिन दोनों के बीच दंगों के दर्द ने इतनी गहरी खाई पैदा कर दी है कि वह आज भी दूसरे समुदाय को आशंका की नजर से देखते हैं।

दंगों पर बात करते वक्त संजय कौशिक ने रूंधे गले से कहा कि दंगों से एक साल करीब पहले करीब तीस लाख रुपये में पहले घर बसाया था। दिल्ली में अपनी छत होने के बाद सबने सकून की सांस ली थी। लेकिन क्या पता था कि दंगाइयों की नजर लग जाएगी। वह भी ऐसी कि छह लोगों का हमारा परिवार साल भर बाद भी इसमें नहीं रह सका है। इसकी जगह गंगा विहार में शिफ्ट होना पड़ेगा। कौशिक ने बताया कि आज भी हिम्मत नहीं बनती कि वापस बृजपुरी का रूख किया जाए।  किसी तरह से रकम का इंतजाम कर घर की मरम्मत कराना शुरू की है, लेकिन इसके तैयार होने के बाद इसमें अब उनका परिवार नहीं रहेगा। घर को तैयार करने के बाद इसे किरायेदारों को सौंप दिया जाएगा।
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मेहताब कमर का दर्द भी कुछ ऐसा ही है। उनका कहना है कई साल विदेश में रहने के बाद उन्होंने अपने परिवार के लिए घर को तैयार करवाया गया था। घर के नीचे रोजी रोटी के लिए एक्रेलिक शीट की भी दुकान खोली थी, लेकिन दंगाइयों ने पल भर में ही सब कुछ खत्म कर दिया गया था। किसी तरह परिवार व खुद की तो जान बचा ली, लेकिन सदमा इतना गहरा लगा कि सप्ताह भर तक अस्पताल का मुंह देखना पड़ा। दंगाइयों ने घर में तोड़फोड़ के साथ पूरे घर व दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया था। आज भी घर में दंगे की वजह से बनी दरारें मौजूद हैं जो रह-रह कर खौफनाक मंजर को याद दिलाती हैं। 

मेहताब ने बड़ी मायूसी में कहा कि यहां के लोग कसूरवार नहीं हैं, किसी ने भी दूसरे का नुकसान नहीं पहुंचाया है। बाहर से बड़ी संख्या में लोग आए थे और दंगों को अंजाम दिया था। गली के सभी लोग इसे जानते हैं। फिर भी, आज भी हर कोई मन में एक दूसरे को कसूरवार मानकर बैठा हुआ है। सामाजिक ताने-बाने को दुबारा जोड़ने के लिए बड़ी कोशिश की जरूरत है।

दंगों से पुश्तैनी कारोबार हुआ बर्बाद, खौफ आज भी कायम

दंगों से पहले भजनपुरा चौक पर राहुल गुप्ता और भूरेखान की अगल-बगल में फलों की दुकान थी। दोनों ग्राउंड फ्लोर पर दुकानदारी करते थे, रिहायश पहली मंजिल पर थी। मुख्य चौक पर काम होने से कमाई भी ठीक-ठाक हो जाती थी। पड़ोसी होने से दोनों परिवारों में दिली रिश्ता कायम हो गया था, दंगों की तपिश ने जिसे तार-तार कर दिया है। राहुल गुप्ता व भूरेखान आज फुटपाथ पर दुकान कर रहे हैं, लेकिन रहना आज तक अपने मकान में नहीं हो सका है। दंगों का खौफ दोनों में आज भी कायम है।

भूरेखान बताते हैं कि उपद्रवियों ने मेरी तीनों दुकानों को जला दिया था। 35 साल से इन्हीं दुकानों के सहारे हम अपने परिवारों को पाल रहे थे। उसके बाद सबसे बड़ी मुश्किल परिवार को पालने की थी। परिजनों के सहयोग से जिंदगी पटरी पर लौटी तो सही। सरकार की आर्थिक सहायता भी मिली, लेकिन उजड़ी हुई दुकानों को फिर से जमाने की कवायद अभी तक भी चल रही है।

कभी नहीं सोचा था कि दंगों के बाद जीवन इस तरह बदल जाएगा। भूरेखान ने बताया कि अपना मकान होते हुए भी दूसरे इलाके मे किराए पर रहते हैं। आज डभी अपने मकान में वापस लौटना नहीं हो सका है। भूरे खान उस पल को याद करते हुए कहते है कि दंगाइयों की भीड़ का मकसद बस लोगों को नुकसान पहुंचाना था। उस दौरान जो चज भी उनके सामने थी। वह उसे तबाह कर रहे थे। उस पल को जीवन में कभी याद नहीं करना चाहता। बस यही उम्मीद है कि जल्द से जल्द जिंदगी फिर से पहले जैसी हो जाए।

भूरेखान के पड़ोस में राहुल गुप्ता की भी दुकान थी, जिसे दंगाइयों ने पिछले 24 फरवरी को आग के हवाले कर दिया था। राहुल गुप्ता ने बताया कि भीड़ को देख सड़क की दूसरी तरफ भाग गया। वहां से आंखों के सामने ही भयानक मंजर को देखा था। घटना के एक सप्ताह बाद वह अपनी दुकान पर लौटे थे। दंगाइयों ने ऐसी तबाही मचाई थी कि कुछ नहीं बचा था। सारा फर्नीचर जला हुआ था और फल बाहर पड़े थे। सटर भी तबाह हो गया था। 25 साल से जिस दुकान के सहारे पूरा परिवार का पालन पोषण हो रहा था, उसकी ऐसी हालत देखकर हिम्मत टूट चुकी थी। एक पल के लिए सोचा कि यहां से कई और जाकर कारोबार जमाएंगे, लेकर न आसपास रहने वाले दूसरे समुदाय के लोगों ने उन्हे विश्वास दिलाया कि अब उन्हे यहां कोई परेशानी नहीं होगी। 

राहुल गुप्ता की पीड़ा टूटे सामाजिक ताने-बाने को लेकर दिखी। उनका कहना था कि दंगों के बाद दुकान तो लगा ली, लेकिन अब माहौल पहले जैसा नहीं रहा है। पहले दुकान रात 11 बजे तक चलती थी। अब 9 बजे ही बंद करके घर चले जाते हैं। जिस भीड़ ने यहां की दुकानों को आग लगाई। वह लोग आसपास के इलाकों के नहीं थे। बाहरी लोगों ने आकर तबाही मचाई थी। लेकिन उस घटना के बाद से दोनों समुदाय के लोगों के मन में दूरियां बढ़ गई है। अब हमेशा मन में एक डर बना रहता है कि पता नहीं कब क्या हो जाए।
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दिल्ली हिंसा के जख्मों पर 28 करोड़ का मरहम

दंगा प्रभावित परिवारों के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए दिल्ली सरकार ने 28 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया। इस हिंसा में 53 लोगों की जानें गईं। इनमें उत्तर पूर्व  जिले के 44 मृताश्रितों सहित 700 से अधिक दुकानें और दो सौ से अधिक घरों को हुए नुकसान भी भरपाई की गई।

उत्तर पूर्वी दिल्ली के जिलाधिकारी पंकज कुमार के मुताबिक हिंसा प्रभावितों को हुए नुकसान की भरपाई के तौर पर 28 करोड़ रुपये दिए गए हैं। व्यस्क मृतकों के आश्रितों को 10-10 लाख, नागालिग के परिजनों को पांच और घायलों को भी मुआवजा दिए गए हैं। इसमें 700 से अधिक दुकानें क्षतिग्रस्त हुई और उपद्रवियों ने करीब 200 घरों को भी नुकसान पहुंचाया।

700 से अधिक दुकानों को नुकसान, अभी भी किराये पर रह रहे हैं कुछ परिवार
करावल नगर क्षेत्र में 293 दुकानें, यमुना विहार क्षेत्र में 247 दुकानें, जबकि सीलमपुर में 185 दुकानों सहित 200 से अधिक आशियाने भी उपद्रव से प्रभावित हुए। यमुना विहार में सीलमपुर में 185 दुकानें क्षतिग्रस्त हुई जबकि सात मृतकों को भी मुआवजा दिया गया। तीनों क्षेत्रों में 200 से अधिक घरों को भी नुकसान पहुंचा। इस वजह से कई प्रभावित लोग अभी भी किराये के मकानों में रह रहे हैं।
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