दंगों से पहले भजनपुरा चौक पर राहुल गुप्ता और भूरेखान की अगल-बगल में फलों की दुकान थी। दोनों ग्राउंड फ्लोर पर दुकानदारी करते थे, रिहायश पहली मंजिल पर थी। मुख्य चौक पर काम होने से कमाई भी ठीक-ठाक हो जाती थी। पड़ोसी होने से दोनों परिवारों में दिली रिश्ता कायम हो गया था, दंगों की तपिश ने जिसे तार-तार कर दिया है। राहुल गुप्ता व भूरेखान आज फुटपाथ पर दुकान कर रहे हैं, लेकिन रहना आज तक अपने मकान में नहीं हो सका है। दंगों का खौफ दोनों में आज भी कायम है।
भूरेखान बताते हैं कि उपद्रवियों ने मेरी तीनों दुकानों को जला दिया था। 35 साल से इन्हीं दुकानों के सहारे हम अपने परिवारों को पाल रहे थे। उसके बाद सबसे बड़ी मुश्किल परिवार को पालने की थी। परिजनों के सहयोग से जिंदगी पटरी पर लौटी तो सही। सरकार की आर्थिक सहायता भी मिली, लेकिन उजड़ी हुई दुकानों को फिर से जमाने की कवायद अभी तक भी चल रही है।
कभी नहीं सोचा था कि दंगों के बाद जीवन इस तरह बदल जाएगा। भूरेखान ने बताया कि अपना मकान होते हुए भी दूसरे इलाके मे किराए पर रहते हैं। आज डभी अपने मकान में वापस लौटना नहीं हो सका है। भूरे खान उस पल को याद करते हुए कहते है कि दंगाइयों की भीड़ का मकसद बस लोगों को नुकसान पहुंचाना था। उस दौरान जो चज भी उनके सामने थी। वह उसे तबाह कर रहे थे। उस पल को जीवन में कभी याद नहीं करना चाहता। बस यही उम्मीद है कि जल्द से जल्द जिंदगी फिर से पहले जैसी हो जाए।
भूरेखान के पड़ोस में राहुल गुप्ता की भी दुकान थी, जिसे दंगाइयों ने पिछले 24 फरवरी को आग के हवाले कर दिया था। राहुल गुप्ता ने बताया कि भीड़ को देख सड़क की दूसरी तरफ भाग गया। वहां से आंखों के सामने ही भयानक मंजर को देखा था। घटना के एक सप्ताह बाद वह अपनी दुकान पर लौटे थे। दंगाइयों ने ऐसी तबाही मचाई थी कि कुछ नहीं बचा था। सारा फर्नीचर जला हुआ था और फल बाहर पड़े थे। सटर भी तबाह हो गया था। 25 साल से जिस दुकान के सहारे पूरा परिवार का पालन पोषण हो रहा था, उसकी ऐसी हालत देखकर हिम्मत टूट चुकी थी। एक पल के लिए सोचा कि यहां से कई और जाकर कारोबार जमाएंगे, लेकर न आसपास रहने वाले दूसरे समुदाय के लोगों ने उन्हे विश्वास दिलाया कि अब उन्हे यहां कोई परेशानी नहीं होगी।
राहुल गुप्ता की पीड़ा टूटे सामाजिक ताने-बाने को लेकर दिखी। उनका कहना था कि दंगों के बाद दुकान तो लगा ली, लेकिन अब माहौल पहले जैसा नहीं रहा है। पहले दुकान रात 11 बजे तक चलती थी। अब 9 बजे ही बंद करके घर चले जाते हैं। जिस भीड़ ने यहां की दुकानों को आग लगाई। वह लोग आसपास के इलाकों के नहीं थे। बाहरी लोगों ने आकर तबाही मचाई थी। लेकिन उस घटना के बाद से दोनों समुदाय के लोगों के मन में दूरियां बढ़ गई है। अब हमेशा मन में एक डर बना रहता है कि पता नहीं कब क्या हो जाए।
दंगा प्रभावित परिवारों के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए दिल्ली सरकार ने 28 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया। इस हिंसा में 53 लोगों की जानें गईं। इनमें उत्तर पूर्व जिले के 44 मृताश्रितों सहित 700 से अधिक दुकानें और दो सौ से अधिक घरों को हुए नुकसान भी भरपाई की गई।
उत्तर पूर्वी दिल्ली के जिलाधिकारी पंकज कुमार के मुताबिक हिंसा प्रभावितों को हुए नुकसान की भरपाई के तौर पर 28 करोड़ रुपये दिए गए हैं। व्यस्क मृतकों के आश्रितों को 10-10 लाख, नागालिग के परिजनों को पांच और घायलों को भी मुआवजा दिए गए हैं। इसमें 700 से अधिक दुकानें क्षतिग्रस्त हुई और उपद्रवियों ने करीब 200 घरों को भी नुकसान पहुंचाया।
700 से अधिक दुकानों को नुकसान, अभी भी किराये पर रह रहे हैं कुछ परिवार
करावल नगर क्षेत्र में 293 दुकानें, यमुना विहार क्षेत्र में 247 दुकानें, जबकि सीलमपुर में 185 दुकानों सहित 200 से अधिक आशियाने भी उपद्रव से प्रभावित हुए। यमुना विहार में सीलमपुर में 185 दुकानें क्षतिग्रस्त हुई जबकि सात मृतकों को भी मुआवजा दिया गया। तीनों क्षेत्रों में 200 से अधिक घरों को भी नुकसान पहुंचा। इस वजह से कई प्रभावित लोग अभी भी किराये के मकानों में रह रहे हैं।