हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर मंगलवार को सूफी वसंतोत्सव का आयोजन किया गया। बसंत पंचमी के मौके पर दरगाह को पीले गेंदे के फूलों से सजाया गया था। वसंतोत्सव में शामिल लोगों ने पीले रंग का पटका व पगड़ी पहनी हुई थी।
सूफी वसंतोत्सव में शामिल होने देशभर के कव्वाल हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर पहुंचे थे। जिनके द्वारा हजरत मिजामुद्दीन औलिया की शान में भव्य कव्वाली (महफिल-ए-शमा) पेश की गई।
हजरत निजामुद्दीन औलिया के जमाने से यहां पर सूफी बसंतोत्सव का आयोजन होता आ रहा है। दरगाह के खादिम सैय्यद कलीम निजामी ने बताया कि तेरहवीं शताब्दी में हजरत अमीर खुसरो ने हजरत निजामुद्दीन औलिया को खुश करने के लिये सबसे पहले कव्वाली पेश की थी। उस दिन बसंत पंचमी थी, तब से हर साल बसंत पंचमी के मौके पर सूफी वसंतोत्सव का आयोजन किया जाता है। यह हजरत निजामुद्दीन दरगाह की समृद्ध परंपरा का अहम हिस्सा है।
इस तरह वसंतोत्सव का आयोजन केवल हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर ही होता है। वैसे तो हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर रोजाना कव्वाली होती है। दरगाह के सामने कव्वाल कव्वाली पेश करते हैं। लेकिन सूफी वसंतोत्सव के मौके पर दरगाह के अंदर और बाहर दो जगहों पर कव्वाली पेश की जाती है।
मंगलवार को हजरत निजामुद्दीन के कव्वालों के अलावा देशभर से आए कव्वालों ने कव्वाली पेश की। इस बार कोविड-19 के चलते सूफी वसंतोत्सव के मौके पर सामान्य सजावट हुई थी जबकि इससे पहले के वसंतोत्सव में यहां रंग-बिरंगी लाइटें लगाई जाती हैं। आकर्षक सजावट की जाती है।