विपक्षी दलों के विरोध के बीच केंद्र सरकार ने शुक्रवार को दिल्ली के तीन नगर निगमों को फिर से एक करने संबंधी दिल्ली नगर निगम (संशोधन) विधेयक, 2022 को लोकसभा में पेश किया। विपक्ष ने बिल को जहां असांविधानिक और संघीय ढांचे पर प्रहार बताया तो सरकार ने इसे दिल्ली के लोगों के हित में लिया गया फैसला करार दिया।
प्रश्नकाल के बाद केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने जैसे ही बिल पेश करने की प्रक्रिया शुरू की, कांग्रेस, आरएसपी और बसपा समेत विपक्षी सांसद हंगामा करने लगे। विपक्षी की आपत्तियों को खारिज करते हुए राय ने कहा कि बिल को पेश करना कहीं से भी देश के संविधान की मूल भावना का उल्लंघन नहीं है और न ही यह संघीय ढांचे के खिलाफ है। देश का संविधान केंद्र को कानून बनाने, उसमें बदलाव करने का अधिकार देता है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 239(ए)(ए) के तहत दिल्ली से जुड़े इस कानून में संशोधन करने में सदन सक्षम है। उन्होंने कहा कि दिल्ली में तीन समवर्ती नगर निगमों के सृजन का मुख्य उद्देश्य जनता को प्रभावी नागरिक सेवाएं उपलब्ध कराना था लेकिन पिछले 10 वर्षों का अनुभव यह दिखाता है कि ऐसा नहीं हुआ। सरकार ने सही मंशा और दिल्ली के लोगों की भलाई के लिए यह फैसला लिया है।
विपक्ष ने कहा-संविधान के प्रावधानों के खिलाफ : बिल पेश किये जाने का विरोध करते हुए आरएसपी के एनके प्रेमचंद्रन ने कहा कि यह बिल दिल्ली सरकार और दिल्ली विधानसभा के अधिकार क्षेत्र का हनन करता है। उन्होंने कहा कि सदस्यों को बिल के मसौदा का अध्ययन करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला और इसका मसौदा जटिल है। कांग्रेस के गौरव गोगोई ने कहा कि यह बिल संघीय ढांचे पर प्रहार है। इसे सदन में लाने से पहले केंद्र सरकार ने राजनीतिक दलों और अन्य हितधारकों से कोई विचार-विमर्श नहीं किया।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अपनी विफलताओं को छिपाने के प्रयास में जल्दबाजी में यह विधेयक लाई है। कांग्रेस के ही मनीष तिवारी ने कहा कि हम इस विधेयक को पेश किये जाने का इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि यह इस सदन की विधायी दक्षता एवं दायरे से बाहर का विषय है।
आखिर बिल में है क्या
- विधेयक के उद्देश्यों एवं कारणों में कहा गया है कि वर्ष 2011 में दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्य क्षेत्र की विधानसभा द्वारा दिल्ली नगर निगम संशोधन अधिनियम 2011 द्वारा उक्त अधिनियम को संशोधित किया गया था जिससे उक्त निगम का तीन पृथक निगमों में विभाजन हो गया।
- दिल्ली नगर निगम के तीन भागों में विभाजन करने का मुख्य उद्देश्य जनता को अधिक प्रभावी नागरिक सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए दिल्ली में विभिन्न केंद्रों में नगर पालिकाओं का सृजन करना था, फिर भी दिल्ली नगर निगम का तीन भागों में विभाजन राज्य क्षेत्रीय प्रभागों और राजस्व सृजन की संभाव्यता के अर्थ में असमान था।
- इसमें कहा गया है कि समय के साथ तीनों नगर निगमों की वित्तीय कठिनाइयों में वृद्धि हुई जिससे वे अपने कर्मचारियों को वेतन और सेवानिवृत्ति फायदे प्रदान करने में अक्षम हो गए।
- वेतन और सेवानिवृत्ति फायदे प्रदान करने में देरी का परिणाम कर्मचारियों द्वारा निरंतर हड़ताल के रूप में सामने आया जिसने न केवल नागरिक सेवाओं को प्रभावित किया बल्कि इससे सफाई और स्वच्छता से संबंधित समस्याएं भी खड़ी हुईं।
- तीन नगर निगमों की ऐसी वित्तीय कठिनाइयों का परिणाम उनकी संविदा संबंधी और कानूनी बाध्यताओं को पूरा करने में अनियमित विलंब के रूप में हुआ जिसने दिल्ली में नागरिक सेवाओं के बनाए रखने में गंभीर बाधाएं खड़ी कीं।
दिल्ली नगर निगमों के चुनाव को लेकर दिल्ली विधानसभा में चर्चा हुई। नियम 55 के तहत अल्पकालिक चर्चा की शुरुआत संजीव झा ने की। सत्ता पक्ष ने जहां विपक्ष पर हार के डर से नगर निगम के एकीकरण को लेकर विपक्ष को घेरा। वहीं, विपक्ष ने कहा कि दिल्ली सरकार एकीकरण तो चाहती है, लेकिन एमसीडी चुनाव के बाद तर्कहीन है।
चर्चा में हिस्सा लेते हुए सदन में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से डरकर देश चलाते-चलाते प्रधानमंत्री एमसीडी चलाने के स्तर पर पहुंच गए हैं। पहली बार एक छोटी पार्टी से घबराकर केंद्र में बैठी सरकार चुनाव रोकने के लिए संसद में बिल लेकर आई है।
केंद्र ने तीनों निगमों के एकीकरण के बाद अस्तित्व में आने वाले दिल्ली नगर निगम से दिल्ली सरकार को पूरी तरह से दूर करने का निर्णय लिया है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से शुक्रवार को लोकसभा में पेश दिल्ली नगर निगम अधिनियम-1957 में संशोधन करने संबंधी दिल्ली नगर निगम (संशोधन) विधेयक-2022 में दिल्ली सरकार यानी सरकार के स्थान पर केंद्र सरकार कर दिया। संसद के दोनों सदनों में यह विधेयक पास होने के बाद दिल्ली नगर निगम के कामकाज से दिल्ली सरकार का कोई वास्ता नहीं रहेगा।
दिल्ली नगर निगम सीधे तौर पर केंद्र के अधीन आ जाएगा। गृह मंत्रालय ने दिल्ली सरकार से दिल्ली नगर निगम अधिनियम की 17 धाराओं का अधिकार भी लेेने का निर्णय लिया है। विशेषज्ञों के अनुसार दिल्ली नगर निगम का आयुक्त नियुक्त करने में दिल्ली सरकार की कोई भूमिका नहीं रहेेगी। इसके अलावा दिल्ली सरकार न तो दिल्ली नगर निगम के अधिकारियों को तलब कर सकेगी और न हीनिगम को कामकाज के मामले में निर्देश दे सकेगी।
दूसरी ओर दिल्ली नगर निगम को अपने गठन और कामकाज से संबंधित एक भी फाइल दिल्ली सरकार के पास नहीं भेजनी पड़ेगी। नगर निगम की इस तरह की फाइलों को उपराज्यपाल स्वीकृति देंगे। इसके अलावा नगर निगम को अपनी बैठकों का एजेंडा भी दिल्ली सरकार को नहीं देना होगा।
निगम प्रशासक की नियुक्ति भी केंद्र करेगा
निगम चुनाव नहीं होने तक भी दिल्ली सरकार प्रत्यक्ष ही नहीं, अप्रत्यक्ष तौर पर भी निगम की कमान नहीं संभाल पाएगी। दरअसल नगर निगम के चुनाव नहीं होने तक उसकी कमान किसी वरिष्ठ आईएएस अधिकारी या फिर सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी को प्रशासक नियुक्त करके दी जाएगी। निगम प्रशासक भी केंद्र ही नियुक्त करेगा।