दिल्ली फिलवक्त सघन बसावट वाला शहर है। 2011 की जनगणना के अनुसार, यहां एक वर्ग किमी में 11,320 लोगों की रिहायश है। आने वाले वक्त में क्षेत्रफल बढ़ेगा नहीं, लेकिन आबादी दिल्ली की तेजी से बढ़ रही है। 2040 तक दिल्ली की आबादी तीन करोड़ के करीब पहुंच जाएगी, 2011 में जो 1.13 करोड़ थी। दिल्ली का करीब 75 फीसदी हिस्सा यानि 1483 वर्ग किमी शहरी है।
बढ़ती आबादी की चुनौतियों का माकूल समाधान करने के लिए डीडीए ने मास्टर प्लान 2041 का ड्राफ्ट जारी कर दिया है। इस पर आ रही प्रतिक्रियाएं काफी उत्साहवर्धक हैं। विशेषज्ञों समेत आम लोगों की राय है कि दिल्ली की बसावट का इस तरह से नियोजित किया जाना चाहिए, जिससे आम लोगों को बुनियादी सुविधाएं हासिल हो सकें। विशेषज्ञ रेंटल हाउसिंग समेत ट्रांजिट ओरिएंटेड डवलेपमेंट (टीओडी) सरीखी परियोजनाएं युद्धस्तर पर लागू करने की सलाह दे रहे हैं।
इससे करीब तीन करोड़ की आबादी को छह मुहैया कराना आसान होगा। इसके साथ स्लम और अनाधिकृत कालोनियों को दोबारा नए सिरे से विकसित करने के लिए पीपीपी मॉडल पर काम करने की जरूरत है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अनाधिकृत कालोनियों का नए सिरे से विकास किया जाए तो मेट्रो और रेल लाइन के नजदीक के इलाकों को भी विकसित कर सभी वर्गों के लिए रिहायश की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं।
विशेषज्ञों ने कहा...
जापान की तर्ज पर दिल्ली में भी लागू करनी होगी रेंटल पॉलिसी
दिल्ली की आबादी में बढ़ोतरी के बाद 20 साल बाद आंकड़ा तीन करोड़ से अधिक होगी। इससे और अधिक मकानों की जरूरत होगी जबकि अनाधिकृत कालोनियों और स्लम को नए सिरे से विकिसित करना होगा। इसके लिए रेंटल हाउसिंग परियोजनाओं को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत बढ़ावा देने से रिहायशी की कमी दूर होने के साथ साथ बुनियादी सुविधाएं भी बेहतर होंगी। जापान में अभी भी रेंटल हाउसिंग का प्रचलन है, जिसे अपनाने से मौजूदा संसाधनों के साथ ही दिल्ली को नई शक्ल दी जा सकती है। रेंटल हाउसिंग परियोजना के तहत सरकारी जमीन पर निजी क्षेत्र के सहयोग से हाउसिंग प्रोजेक्ट को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे कम जगह में अधिक लोगों के लिए रहने की सुविधा होगी।
स्लम की बजाय बहुमंजिला इमारतें बनाई जा सकती है। अनाधिकृत कालोनियों की बजाय छोटे छोटे टाउनशिप को अमली जामा पहनाने से लोगों को सेक्टरों की तरह मॉल्स, दुकानें, क्लब, चिकित्सा सुविधाओं के लिए नए निर्माण किए जा सकते हैं। इससे लोगों को जहां बेहतर बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी तो दूसरी तरफ सरकार को भी वाणिज्यिक परिसरों से आय होगा। दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में रहने वालों की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए एनसीआर प्लानिंग बोर्ड को विस्तार देते हुए नया कानून बनाने से भी काफी हद तक संभावित परेशानियों को दूर किया जा सकता है।
टीओडी परियोजना से कंपनियों में काम करने वालों को घरों के आसपास ही तमाम सुविधाएं उपलब्ध होंगी। एनसीआर के शहरों के दूसरे राज्यों में होने की वजह से भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए एकीकृत शहरों के लिए अलग प्रावधान होना चाहिए। इससे किसी भी काम के लिए बार बार राज्य सरकारों से मंजूरी लेने की बजाय बोर्ड से बुनियादी सुविधाओं की बेहतरी से जुड़ी परियोजनाओं को मूर्त रूप देना आसान होगा।
-शोवन के साहा, पूर्व प्रोफेसर स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर, नई दिल्ली
घनी बसावट को नियोजित करने के लिए नए सिरे से काम करना जरूरी
जमीन की सीमित उपलब्धता और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए स्लम कॉलोनियों में रहने वालों का सर्वेक्षण कर उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए बुनियादी सुविधाओं को नए सिरे से विकसित करना होगा। बहुमंजिला इमारतों के निर्माण के साथ साथ बुनियादी सुविधाओं को नए सिरे से विकसित करने की जरूरत है।
सभी वर्गों के लिए रिहायश की जरूरतों को पूरा करने के लिए पहले जरूरी है कि कनेक्टिविटी को बेहतर किया जाए। हालात सुधरने पर लोगों को किसी भी क्षेत्र में रहने के लिए बसावट को बढ़ावा मिलेगी। दफ्तरों और कार्यक्षेत्र के नजदीक इमारतों के निर्माण से एक साथ हजारों परिवारों की रिहायश की जरूरतें पूरी होंगी। घनी आबादी वाले इलाकों में नए सिरे से विकसित करना होगा ताकि एक जगह पर ही लोगों की जरूरतें पूरी हो सके।
निजी क्षेत्रों के सहयोग से लोगों के लिए मकान के लिए ऐसी योजना की शुरुआत जरूरी है ताकि सभी वर्गों को अपनी जरूरतों को पूरा करने का मौका मिल सके। इससे दिल्ली की शक्ल भी बदलेगी।
-डॉ. पीके सरकार, स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर, दिल्ली के विजिटिंग फैकल्टी