मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति संजीव नरूला की पीठ ने दिल्ली सरकार के सतर्कता निदेशालय और विशेष सचिव (सतर्कता) की अपील का निपटारा कर दिया, जिसमें कारण बताओ नोटिस जारी किए गए पीडब्ल्यूडी अधिकारियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने के एकल न्यायाधीश पीठ के आदेश को चुनौती दी थी।
उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यह बहुत स्पष्ट है कि सेवा विवाद के संबंध में पहली बार में प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम की धारा 19 के तहत एक आवेदन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। खंडपीठ ने कहा इसलिए, एकल न्यायाधीश के समक्ष पीडब्ल्यूडी अधिकारियों की रिट याचिका बिल्कुल भी सुनवाई योग्य नहीं है और इसे यहीं खारिज कर दिया जाना चाहिए था।
खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के समक्ष लंबित याचिका का निपटारा कर दिया और छह पीडब्ल्यूडी अधिकारियों को प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम के तहत एक मूल आवेदन दायर करके कैट से संपर्क करने की स्वतंत्रता दी। सतर्कता निदेशालय ने अपनी अपील में उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश के 15 सितंबर के अंतरिम आदेश को रद्द करने की मांग की, जिसमें कहा गया था कि 12 अक्टूबर तक याचिकाकर्ता पीडब्ल्यूडी अधिकारियों के खिलाफ किसी भी प्राधिकारी द्वारा कोई कठोर कदम नहीं उठाया जाएगा।
अपीलकर्ताओं ने प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए कहा कि रिट याचिका बिल्कुल भी सुनवाई योग्य नहीं है क्योंकि अधिकारी केंद्र सरकार के कर्मचारी हैं और अनुशासनात्मक कार्रवाई के संबंध में चुनौती के लिए उन्हें कैट से संपर्क करना होगा। सतर्कता निदेशालय ने केजरीवाल के आधिकारिक आवास के नवीनीकरण में नियमों के कथित उल्लंघन पर छह पीडब्ल्यूडी अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। संबंधित मुख्य अभियंताओं और अन्य पीडब्ल्यूडी अधिकारियों को जारी किए गए नोटिस में उनसे अपने कार्यों की व्याख्या करने को कहा गया है।
पीडब्ल्यूडी अधिकारियों ने अपनी याचिका में कहा कि उन्होंने किसी भी नियम, क़ानून या कार्यालय आदेश का उल्लंघन नहीं किया है और मुख्यमंत्री के आधिकारिक बंगले के संबंध में किया गया कार्य पूरी तरह से उनके आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए किया गया था।