दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को नई आबकारी नीति 2021-22 के तहत शराब की होम डिलीवरी को भाजपा सांसद परवेश साहिब सिंह वर्मा की चुनौती याचिका पर नोटिस जारी करने से इनकार कर दिया। अदालत ने उन्हें याचिका में आम आदमी पार्टी को पक्ष बनाने पर आपत्ति जताते हुए उसे सूची से हटाने का निर्देश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की खंडपीठ ने आम आदमी पार्टी को पक्ष बनाने पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आप किसी राजनीतिक दल में क्यों शामिल हों? अदालत ने कहा इस प्रकार की याचिका पर वे नोटिस जारी नहीं कर रहे हैं।
अदालत ने वर्मा को पक्षकारों के संशोधित सूची जारी करने का निर्देश देते हुए सुनवाई 9 अगस्त तक स्थगित कर दी। पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह उनकी पार्टी के घोषणापत्र में था। आप याचिका से उनका नाम हटाए।
वर्मा के वकील ने दलील दी कि शराब की होम डिलिवरी संविधान और जन स्वास्थ्य के अनुच्छेद 47 के खिलाफ है। संविधान के अनुच्छेद 47 में कहा गया है कि जन स्वास्थ्य में सुधार करना और मादक पेय पदार्थों के सेवन पर रोक लगाने का प्रयास करना राज्य का कर्तव्य है।
वर्मा की ओर से पेश हुए अधिवक्ता बालाजी श्रीनिवासन ने कहा कि शराब के सेवन से न केवल व्यक्तियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है बल्कि घरेलू हिंसा के मामलों में भी वृद्धि हो जाती है। हालांकि अदालत ने पहले सुनवाई शुरु की लेकिन जब पीठ ने आम आदमी पार्टी को पक्ष बनाने को देखा तो सुनवाई से इंकार करते हुए इसे संशोधन करने का निर्देश दिया।
दिल्ली उत्पाद शुल्क (संशोधन) नियम, 2021 के नियम 66 (6) को चुनौती देते हुए अपनी याचिका में वर्मा ने कहा है कि नई नीति ऐसे समय में लागू की गई थी जब राष्ट्रीय राजधानी अभी भी घातक कोविड की दूसरी लहर और दवाओं और टीकाकरण की भारी कमी से जूझ रही है।
उन्होंने कहा यह संशोधित नीति सार्वजनिक स्थानों पर शराब पहुंचाने के लिए संभव बनाकर सार्वजनिक स्थानों पर शराब की खपत पर प्रतिबंध को नजरअंदाज करती है और नियम अस्पतालों और स्कूलों में शराब की डिलीवरी की संभावना को सक्षम करती हैं। यह शराब पहुंचाने वालों की सुरक्षा के लिए किसी भी विचार का अभाव है। सरकार ने घरेलू और बाल दुर्व्यवहार पर घरों में शराब लाने के प्रभाव की अनदेखी की है।