नई दिल्ली। उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगा मामले में संरक्षित गवाहों की पहचान सार्वजनिक होने पर अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। ऐसे तीन गवाहों से मामले से जुड़े हुए लोगों ने संपर्क किया जिसके बाद से उनमें डर की स्थिति पैदा हो गई। अदालत ने यह तथ्य सामने आने के बाद संरक्षित गवाहों के नाम वाली सभी चार्जशीट लौटाने का निर्देश आरोपियों के वकीलों को दिया है। अदालत ने कहा इन गवाहों की पहचान हर सूरत में गोपनीय रखी जाए।
कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत के समक्ष विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा 44 के तहत अर्जी दाखिल कर मामले के संरक्षित गवाहों की पहचान सार्वजनिक होने से उन्हें खतरा होने की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि पुलिस द्वारा पेश चार्जशीट में कुछ संरक्षित गवाहों के बारे में बताया गया है, जो उनकी सुरक्षा के लिए उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि इस मामले में संरक्षित गवाहों का जीवन, आजादी, बचाव और सुरक्षा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसलिए उनकी संरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निर्देश दिए जाएं। कोर्ट ने कहा कि मामले जुड़े संरक्षित गवाहों की पहचान को हर हाल में गोपनीय रखा जाए ताकि मामले में निष्पक्ष सुनवाई हो सके।
कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि वह ऐसे गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और कोई भी गवाहों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संपर्क न करे। अदालत ने कहा जांच अधिकारी ताजा प्रति आरोपियों के वकीलों को अगली सुनवाई पर देंगे। अदालत ने गौर किया कि जांच अधिकारी से गलती हुई है।
इस मामले में डीसीपी पीएस कुशवाहा और एसीपी आलोक कुमार ने 16 सितंबर 2020 को चार्जशीट दायर की थी। इस चार्जशीट में 15 आरोपियों के नाम दिए गए जिनमें आप के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन, सफूरा जरगर, नताशा नरवाल और देवांगना कलीता समेत अन्य लोग शामिल हैं। इस दंगे में 53 लोगों की मौत हुई थी और 250 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।