नई दिल्ली। अदालत ने दिल्ली पुलिस द्वारा अधिवक्ता महमूद प्राचा के कार्यालय पर मारे गए छापे के मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। प्राचा ने अपने मुवक्किल के विशेषाधिकार का मामला बताते हुए छापे के खिलाफ याचिका दायर की है। अदालत ने दोनो पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए प्राचा से कहा कि यदि वह कोई तर्क रखना चाहते हैं तो 22 मार्च से पहले लिखित में दाखिल कर दें।
पटियाला हाउस स्थित मुख्य मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट पंकज शर्मा के समक्ष दिल्ली पुलिस ने सर्च वारंट पर लगाई गई रोक को हटाने का आग्रह किया। उन्होंने मामले में लिखित जवाब पेश करने की अपेक्षा मौखिक रूप से पक्ष रखने का तर्क रखते हुए कहा कि कोई भी आरोपी या व्यक्ति अपने अनुसार जांच करने को नहीं कह सकता।
पुलिस की ओर से पेश अधिवक्ता अमित प्रसाद ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम में सर्च वारंट को रद्द करने का प्रावधान नहीं है। उन्होंने कहा जांच के सिलसिले में किसी भी व्यक्ति के परिसर की तलाशी ली जा सकती है। इस मामले की जांच पूरी तरह कानूनी दायरे में ही की जा रही है। उन्होंने कहा कि मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने सभी तथ्यों को देखने के बाद ही कार्यालय की तलाशी के लिए वारंट जारी किया था।
उन्होंने प्राचा के उस तर्क पर आपत्ति जताई कि डाटा पेन ड्राइव में देने को तैयार हैं। उन्होंने कहा पेन ड्राइव में डाटा देने से जांच का दायर सीमित हो जाएगा, कई तथ्यों की जांच पर प्रभाव पड़ेगा। वहीं प्राचा की ओर से पेश अधिवक्ता ने अभियोजन पक्ष के जवाब पर सुनवाई स्थगित करने का आग्रह किया।
दिल्ली पुलिस का आरोप है कि दिल्ली दंगों के मामले में कुछ फर्जी दस्तावेज अदालत के समक्ष पेश किए गए हैं। पुलिस ने इसी मामले में प्राचा के कार्यालय की दो बार तलाशी ली है। अदालत ने हाल ही में प्राचा के कार्यालय की तलाशी के लिए जारी सर्च वारंट पर अंतरिम रोक लगा दी थी।