म्यूकरमाइकोसिस को ब्लैक फंगस या काला फफूंद कहा जा रहा है। वास्तव में इसका ब्लैक फंगस उपयुक्त नाम नहीं है। इसके तन्तुओं का तो रंग भूरा-सफेद होता है। यह बात अलग है कि जिस स्थान पर यह पनपता है वहां त्वचा का रंग कुछ काला हो जाता है। संभवतया इसी कारण इसेक्लिनीशियन्स ने काले फंगस की संज्ञा दे दी है। यह मिट्टी तथा गले सड़े कार्बनिक पदार्थों पर पनपता है। साधारणतया मनुष्यों में संक्रमण नहीं करता है। विशेष परिस्थितियोंमें इसे यदि मनुष्य की वाह्यत्वचा या किसी आतंरिक अंग में पहुंचने का अवसर मिल जाता हैतो वहां संक्रमण कर देता है।
इसी तरह फ्यूमिगेटस के कॉनीडिआ, त्वचा, नाक, कान, आंख, मुख, गुहा आदि बाह्य अंगों को संक्रमित कर सकते हैं। सांसके द्वारा कॉनिडिआ सीधे फेंफड़ोंमें प्रवेश कर जाते हैं। एस्पर्जिलस संक्रमण सबसे पहले फेफड़े में होता है। सक्षम और प्रभावशाली प्रतिरक्षा तंत्रवाले व्यक्ति इन कॉनिडिआओं को विघटित करके बाहर निकाल देते हैं और फेफड़ों में संक्रमण नहीं होता। परन्तु प्रतिरोधक क्षमता कम होने से फेफड़ों का गंभीर संक्रमण हो जाता है।
दवा के अधिक प्रयोग से शरीर के अंदर रोग-प्रतिरोधक तंत्र अस्थाई रूप से निष्क्रिय हो जाता है। इस वजह से फ्यूमिगेटस फेफड़ों में जाकर एक परत के रूप में फैलने लगता है। इससे ‘एलर्जिक ब्रोंकोपल्मोनरीएस्पर्जिलोसिस’ नामक रोग होता है। इससे लगातार हल्का बुखार, कमजोरी, थकावट, सांस लेने में असुविधा, दमा तथा घातक निमोनिआ जैसे लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं।
कभी-कभी तो यह फेफड़ों की भित्ति में कोटर (कैविटी) भी बना देता है। इसमें फ्यूमिगेटस के तन्तुओं के गुच्छे,गेंदों का रूप धारण कर लेते हैं। कोरोना संक्रमण के समय यदि एस्पर्जिलोसिस हो जाए तो रोगी में श्वसन संबंधित परेशनियों से घिर जाता है। ऐसा देखने में आया है कि रोगी कोरोनामुक्त हो गया है परन्तु निमोनिआ एवं श्वास सम्बन्धी समस्या बनी ही रहती है। कोविड या पोस्ट-कोविडकेसों में मानसिक असंतुलन तथा मस्तिष्क विकार की समस्याकाफी मिली है।