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Land-For-Jobs Scam: लालू की याचिका पर CBI ने किया विरोध, दिल्ली हाईकोर्ट में कहा- नियुक्ति में कोई भूमिका नहीं

Tue, 13 Jan 2026 07:16 PM IST
राहुल तिवारी पीटीआई, नई दिल्ली

सार

Land-For-Jobs Scam: नौकरी के बदले जमीन घोटाला मामले में सीबीआई ने लालू प्रसाद यादव की एफआईआर रद्द करने की याचिका का दिल्ली हाईकोर्ट में विरोध किया। सीबीआई ने कहा कि नियुक्तियों में उनकी कोई भूमिका नहीं थी, इसलिए पूर्व मंजूरी की जरूरत नहीं है।
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लालू प्रसाद यादव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Land-For-Jobs Scam: नौकरी के बदले जमीन घोटाला मामले में लालू प्रसाद यादव की एफआईआर रद्द करने की याचिका पर सीबीआई ने दिल्ली हाईकोर्ट में कड़ा रुख अपनाया है। एजेंसी ने कहा कि रेल मंत्री रहते हुए नियुक्तियों में लालू की कोई प्रत्यक्ष भूमिका या सार्वजनिक कर्तव्य नहीं था। ऐसे में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत पूर्व मंजूरी की जरूरत नहीं बनती।

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सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा के समक्ष तर्क दिया कि ऐसे निर्णय लेने या सिफारिश करने का अधिकार महाप्रबंधकों के पास था। इसलिए, लालू के खिलाफ कार्रवाई के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत पूर्व मंजूरी प्राप्त करने की कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि उनके आचरण को उनके आधिकारिक कार्यों या कर्तव्यों के निर्वहन के दायरे में नहीं माना जा सकता था।

सॉलिसिटर जनरल राजू ने कहा कि मामला यह है कि अपने आधिकारिक कर्तव्यों या कार्यों के निर्वहन में, उन्हें (लालू) कोई सिफारिश करने या निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए, जो भी निर्णय या सिफारिश की गई, वह उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में नहीं थी। सिफारिश या निर्णय केवल महाप्रबंधकों द्वारा ही लिया जा सकता था। मंत्री की कोई भूमिका नहीं थी।

उन्होंने आगे कहा कि इसलिए, नियुक्ति में, नियुक्ति का निर्णय लेने में, रेल मंत्री की कोई भूमिका नहीं थी। यह एक रेल मंत्री के रूप में उनके सार्वजनिक कर्तव्यों के निर्वहन से संबंधित नहीं था। इसलिए, लालू की कोई भूमिका नहीं थी। सीबीआई की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल डीपी सिंह ने सूचित किया कि संबंधित महाप्रबंधकों के खिलाफ कार्रवाई के लिए धारा 17ए के तहत मंजूरी विधिवत रूप से ले ली गई थी।

यह नौकरी के बदले जमीन घोटाला पश्चिम मध्य रेलवे के जबलपुर (मध्य प्रदेश) स्थित जोन में ग्रुप डी की नियुक्तियों से संबंधित है। यह नियुक्तियां लालू प्रसाद के रेल मंत्री के कार्यकाल (2004-2009) के दौरान हुई थीं। इन नियुक्तियों के बदले में, कथित तौर पर जमीन के पार्सल लालू प्रसाद के परिवार या सहयोगियों के नाम पर उपहार के तौर पर या हस्तांतरित किए गए थे।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पहले लालू प्रसाद की ओर से यह तर्क दिया था कि इस मामले में जांच, एफआईआर, जांच और बाद के आरोपपत्रों को कानूनी रूप से बरकरार नहीं रखा जा सकता क्योंकि जांच एजेंसी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत पूर्व मंजूरी प्राप्त करने में विफल रही।
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याचिका में यह भी कहा गया था कि एफआईआर 2022 में दर्ज की गई थी। लगभग 14 साल की देरी के बाद-भले ही सीबीआई की प्रारंभिक पूछताछ और जांच सक्षम न्यायालय के समक्ष क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने के बाद बंद कर दी गई थी।

याचिका में कहा गया है कि पिछली जांचों और उनके क्लोजर रिपोर्टों को छिपाकर नई जांच शुरू करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। याचिकाकर्ता को अवैध, प्रेरित जांच से गुजरना पड़ रहा है, जो निष्पक्ष जांच के उसके मौलिक अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है। यह भी कहा गया कि वर्तमान पूछताछ और जांच दोनों ही अमान्य हैं क्योंकि दोनों धारा 17ए के तहत अनिवार्य मंजूरी के बिना शुरू की गई थीं।
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