फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बात जब देश की हो तो बच्चा-बच्चा भगत सिंह बन जाता है, ऑनलाइन सजी अमर उजाला काव्य कैफे की महफिल

Tue, 26 Jan 2021 06:24 PM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
विज्ञापन
काव्य कैफे - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर अमर उजाला काव्य की ओर से ऑनलाइन काव्य कैफे का आयोजन किया गया। इसमें कई युवा और अनुभवी कवियों ने रचनाएं पेश कीं और अपनी लेखनी के माध्यम से दर्शकों को देशभक्ति की धुन पर झुमाया। डिजिटल माध्यम से हुए इस कार्यक्रम के प्रमुख अंश।
विज्ञापन


नीतीश राजपूत, मेरठ
देश की पहचान को कविता में बयान करते हुए उन्होंने पढ़ा, ‘कानों में आवाज गूंजते ही वंदे मातरम गर्व से सभी का जहां सीना तन जाता है/बात जब देश की अखंडता की हो यहां तो बच्चा-बच्चा भी भगत सिंह बन जाता है/प्रेम बल शौर्य बल सबको मिला दो अगर एक ही पर्याय शब्द हमको दिखाता है/सिंह जन्म लेता जहां मां की हर कोख से नाम उस देश का ही हिंद कहलाता है।

अंकित चहल, गाजियाबाद
विशेष काव्य कैफे की शुरुआत में उन्होंने राष्ट्रध्वज तिरंगे के महत्व और उसके सम्मान पर पढ़ा, ‘हर ओर तिरंगा फहरा दो/वेदों का ज्ञान तिरंगा हो/आयते कुरान तिरंगा हो/पहली पहचान तिरंगा हो/अपना भगवान तिरंगा हो/जीएं तो जान तिरंगा हो/मरकर सम्मान तिरंगा हो/ऐसा वरदान तिरंगा दो/हर ओर तिरंगा फहरा दो।
विज्ञापन


मयंक शर्मा, मुरादाबाद
अपने गीत से शुरुआत करते हुए उन्होंने सरहद पर खड़े सैनिक की उसके परिवार वालों से वार्ता का वर्णन किया। उन्होंने कहा, ‘ये ऋण हम पे है मातृभूमि का अदम्य साहस से तुम चुकाना/हवाएं गाएंगी यश तुम्हारा, गगन में गूंजेगी शौर्यगाथा/खड़ी हूं देहरी पे थाल ले के तभी मैं पूजूंगी तेरा माथा/खुशी के आंसू की बूंद बनकर मेरी आंखों में झिलमिलाना/तुम्हारे आने की चाह में हैं, मगर जो आना विजय से आना।

श्रीराम पांडेय, भोपाल
काव्य पाठ का आगाज तिरंगे के तीनों रंगों का अर्थ बयां करते हुए उन्होंने केसरिया, श्वेत और हरे रंग का अर्थ बताया। इसके बाद पढ़ा, ‘तीन रंग से बना तिरंगा मेरी जान है/इस तिरंगे से बना ये मेरा हिंदुस्तान है।’

सुमेधा शर्मा, गाजियाबाद
वीर रस की कवयित्री ने युवाओं को प्रोत्साहित करते हुए पढ़ा, ‘रग-रग घाव से व्यथित और पीड़ित है आज युवा पीढ़ी को परिस्थिति निहारती/फिर घन नंद फन फुफकारने लगे हैं, फिर चंद्रगुप्त की ये धरती पुकारती/घाव निज भूमि के जो धोते निज रक्त से हैं उनको सपूतों सा दुलारती मां भारती/इस पुण्यभूमि पर इतने शहीद हुए क्यों न गाऊं मैं भी मातृ भारती की आरती।

भारत भूषण शर्मा, गाजियाबाद
एक सैनिक और उसके परिवार की मनोस्थिति की तस्वीर कविता से खींचते हुए उन्होंने पढ़ा, चूम चरण मां के बैठा जब ट्रेन में तो मां का दिल था कि थोड़ा सोच में चला गया/किंतु बाप ने उठाके शीश छाती ठोंक कहा देखो मेरा बेटा फौज में चला गया। अनेक राज्यों में मंचीय काव्य-पाठ कर चुके भारत भूषण शर्मा भारतीय नौसेना से सेवानिवृत्त हैं।

स्वदेश यादव, गाजियाबाद
देश के विकास में महिलाओं के योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने पढ़ा, ‘बेटियों पर प्रतिबंध चाहे जितना लगा हो नवस्वप्न फिर भी सजाती रहीं बेटियां/खेल का मैदान या कि राजनीति का हो क्षेत्र नए कीर्तिमान भी बनाती रहीं बेटियां।
 
विज्ञापन

पीयूष मालवीय, गाजियाबाद
वीर रस के कवि ने सैनिकों के परिवारों के बलिदान का जिक्र करते हुए पढ़ा, ‘गणतंत्र दिवस मनाने हेतु भारत के पिताओं ने बेटे अपने जवान दे दिए/बहनों ने भाई की कलाई पर लपेटकर राखी ही नहीं दी सारे अरमान दे दिए/मांओं ने कलेजे के दिए हैं टुकड़े हजार हंसते हुए जो सीमा पर जान दे दिए/गणतंत्र दिवस मनाने हेतु नारियों ने सर पे सजे हुए सिंदूरदान दे दिए।
 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें