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Delhi : मूर्ति बनाने के लायक भी नहीं बची दिल्ली में यमुना की मिट्टी, कई कारणों से बदल गई माटी की प्रकृति

Fri, 20 Oct 2023 05:39 AM IST
दुष्यंत शर्मा संतोष कुमार, नई दिल्ली

सार

आलम यह है कि इस खराब हुई मिट्टी से दुर्गा पूजा के लिए मूर्तियां भी नहीं बनाई जा सकी हैं। इसकी जगह कई मूतिकारों को पानीपत से यमुना की मिट्टी मंगानी पड़ी है।
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दिल्ली में बदहाल यमुना - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सिकुड़ते फ्लड प्लेन, नालों की गाद और बहाव ने दिल्ली में यमुना की मिट्टी को ही बदल दिया है। आलम यह है कि इस खराब हुई मिट्टी से दुर्गा पूजा के लिए मूर्तियां भी नहीं बनाई जा सकी हैं। इसकी जगह कई मूतिकारों को पानीपत से यमुना की मिट्टी मंगानी पड़ी है। विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली की यमुना में दोमट मिट्टी बची ही नहीं है। यहां का पूरा बाढ़ क्षेत्र गाद और रेत से बना है। इससे कोई आकृति नहीं बन सकती, चाहे वह मूर्ति हो, मिट्टी बर्तन या छोटे-छोटे दीये।

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दरअसल, यमुना का बाढ़ क्षेत्र दोमट से बना है। इसमें तलछट, चिकनी मिट्टी व रेत की निश्चित मात्रा होती है। उपजाऊ होने के साथ इसका इस्तेमाल मूर्तियां व मिट्टी के छोटे-बड़े बर्तन बनाने में होता है, लेकिन दिल्ली के प्रदूषण व बाढ़ क्षेत्र के अतिक्रमण के कारण मिट्टी की प्रकृति बदल गई है। वजीराबाद बांध के बाद से इसमें दोमट मिट्टी की जगह नजफगढ़ नाले की गाद ले लेती है।

पानी का बहाव कम होने से पानी की रेत सतह के निचले हिस्से की मिट्टी को साफ नहीं कर पाती। वह गाद में ऊपर जमा हो जाती है। इस तरह की मिट्टी से वस्तुएं नहीं बनाई जा सकतीं। विशेषज्ञों का कहना है कि इसे सीमेंट व बालू के मिश्रण से समझा जा सकता है। इनकी एक निश्चित मात्रा से मजबूत मकान तैयार होता है, जबकि बालू ज्यादा होने से बनने वाली इमारत टिकाऊ नहीं होगी। दिल्ली की यमुना की मिट्टी में बालू ज्यादा है। 
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यमुना के सफाई प्रोजेक्ट में देरी
दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की हालिया रिपोर्ट में भी यह सामने आया है। एनजीटी को सौंपी गई रिपोर्ट मेंजल बोर्ड और डीडीए द्वारा नदी में प्रदूषण को कम करने के लिए शुरू की गई परियोजनाओं में देरी सामने आई है। यमुना को पुनर्जीवित करने वाली परियोजनाओं में नए सीवेज शोधन संयंत्र (एसटीपी) का निर्माण, मौजूदा संयंत्रों की मरम्मत, अनधिकृत कॉलोनियों में सीवर लाइन बिछाना, सीवर से गाद निकालना और शोधित अपशिष्ट जल का उपयोग शामिल है। 

विशेषज्ञ बोले
दिल्ली में यमुना की प्रकृति ही बदल जाती है। फ्लड प्लेन के आकार व धीमे बहाव से दिल्ली हिस्से की इसकी मिट्टी में बड़ा बदलाव आता है। यहां नदी में दोमट मिट्टी नहीं मिलती। इसकी जगह हल्की बालू और नालों की गाद ले लेती है। इससे इसका इस्तेमाल मूर्ति और बर्तन बनाने में नहीं हो पाता। जबकि ऊपर पानीपत के आसपास और आगरा से आगे चंबल के मिलने के बाद यह अपनी मूल प्रकृति में होती है।  
- प्रो. रामकुमार सिंह, यमुना के शोधार्थी व प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि

यमुना की दिल्ली की प्राकृतिक संरचना ऐसी है, जिसमें बांध आदि से उसका बाढ़ क्षेत्र सीमित हो गया है। इसमें भी नालों से बड़ी मात्रा में गाद आकर मिलती है।  इससे मिट्टी की प्रकृति पूरी तरह बदल जाती है। जगतपुर में जो  थोड़ा है भी, लेकिन उसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर नहीं हो सकता। 
- प्रो. शशांक शेखर, प्रोफेसर, भूविज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

मूर्तिकारों की राय
बहते पानी की मिट्टी ही मूर्तियों के लिए उपयोगी है। वजह यह कि इससे रेती बह जाती है और मिट्टी चिकनाई व चमक पा लेती है। इससे मूर्तियों में दरार नहीं आती। दिल्ली की यमुना की मिट्टी में यह खूबी नहीं है। तभी हम लोग पानीपत से यमुना की मिट्टी लाते हैं। 
- सुंदर चित्रकार, पिलंजी गांव (तीन माह पहले पश्चिम बंगाल से आए)

दिल्ली की यमुना की मिट्टी साफ नहीं होती। इसमें गाद ज्यादा मिली होती है। हम लोग पश्चिम बंगाल से गंगा नदी की मिट्टी लेकर आते हैं। कम होने की सूरत में हरियाणा, पंजाब व यूपी की नदियों की मिट्टी इस्तेमाल होती है। 
- मणिक पाल, सीआर पार्क (पश्चिम बंगाल से सीआर पार्क में छह महीने पहले मूर्ति बनाने पहुंचे)

डीडीए के कार्य में हुई 6 से 12 महीने की देरी
डीपीसीसी की रिपोर्ट के मुताबिक कई खंडों में विभाजित यमुना के डूब क्षेत्रों को पूर्व की स्थिति में लाने संबंधी डीडीए के कार्य में छह से 12 महीने की देरी हुई है। रिपोर्ट से पता चलता है कि नए 124 मिलियन गैलन का निर्माण ओखला में प्रति दिन (एमजीडी) एसटीपी में नौ महीने की देरी हुई है और यह अब अगले साल मार्च तक पूरा होने की उम्मीद है।

इसके अनुसार सोनिया विहार में सात एमजीडी क्षमता वाले एसटीपी के निर्माण में चार महीने की देरी हो गई है, जिसे 2023 के अंत तक पूरा करने का नया लक्ष्य निर्धारित किया गया है। दिल्ली सरकार ने यमुना को फरवरी 2025 तक स्नान मानकों के अनुरूप साफ करने की प्रतिबद्धता जताई है। इन मानकों को पूरा करने के लिए, जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) तीन मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होनी चाहिए और विघटित ऑक्सीजन (डीओ) पांच मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक होनी चाहिए।

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