अपनी सरहद पार करते हुए यमुना बृहस्पतिवार को लालकिले से जा टकराई। थमना इसका यहां भी नहीं हुआ। प्रवाह इतना तेज था कि नदी का पानी रिंग रोड पर दोनों तरफ फैल गया। एक तरफ पानी सलीमगढ़ किले से होते हुए यमुना बाजार तक पहुंच गया तो दूसरे छोर पर दरियागंज तक भी यमुना पहुंच गई। जानकार बताते हैं कि अतीत में यमुना किले के साथ होकर बहती थी। बाढ़ के दौरान उसने अपना पुराना रास्ता पकड़ा और हदें लांघती हुई लालकिले से जा टकराई।
जानकारों की मानें तो दरियागंज मुगल काल में नदी (दरिया) के किनारे बाजार हुआ करता था। यमुना के पश्चिमी तट पर यह बाजार लगता था। वहीं, दोनों ऐतिहासिक इमारतें भी यमुना के तट पर बनी थीं। यह इतिहास में दर्ज है। बाद के काल में यमुना का बहाव पूरब दिशा में खिसक गया और यमुना ने लालकिले से दूरी बना ली। 1978 की बाढ़ के दौरान बाढ़ का पानी इस इलाके तक पहुंचा था। 45 साल हो गए अब दोबारा यमुना का फैलाव लालकिले तक हुआ है। इंटेक के प्राकृतिक विरासत विभाग से जुड़े मनु भटनागर बताते हैं कि सलीमगढ़ की नींव का ऊपरी हिस्सा इस तरह से बना है, जो तेज बहाव को दो भागों में बांटकर बाढ़ के असर को नाकाम कर देता है।
उत्तरी दिल्ली का पूरा इलाका पहले फ्लड प्लेन हुआ करता है। जहांगीरपुरी, भलस्वा झील व लैंडफिल व तिमारपुर के आसपास का बड़ा इलाका दलदली भूमि था। नदी यहां पर हमेशा असर डालती आई है। अब चूंकि नदी को दोनों किनारों से बांध दिया गया है तो चौड़ाई में फैलना इसका संभव नहीं हो रहा है। इसकी जगह अब नदी की ऊंचाई बढ़ती है और जब बहाव ज्यादा होता है तो नदी अपनी सरहद को लांघकर अपने पुराने बहाव क्षेत्र पर चल निकलती है। यमुना के साथ इस वक्त दिल्ली में यही हो रहा है।
बड़े पैमाने पर बदलाव जरूरी
जल बोर्ड के सेवानिवृत्त अधिकारी और यमुना पर गहरी समझ रखने वाले एसए नकवी बताते हैं कि दिल्ली के साथ बुरी चीज यह है कि इसका न तो अपना कोई ड्रेनेज, न ही स्टार्म वाटर मैनेजमेंट का ही कोई प्लान है। पहले जो चीजें थीं, उसे भी खत्म कर दिया गया है। मसलन, अंग्रेजों के समय में करोल बाग में एक नाला होता था, यह आनंद पर्वत, पहाड़गंज होते हुए यमुना में मिलता था। अब यह गायब हो गया है। नतीजा थोड़ी सी बारिश व बाढ़ में यमुना संकट में आ जाती है। ऐसे में अगर दिल्ली को बचाना है तो सरकार को अच्छी कोशिश करके इस दिशा में बड़े पैमाने पर बदलाव करना पड़ेगा।