मल्टीपल स्क्लेरोसिस के गंभीर मरीजों पर स्टेम सेल थेरेपी कारगर हो सकती है। एम्स सहित निजी अस्पतालों में इसे लेकर चल रहे शोध में शुरुआती परिणाम बेहतर मिले हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि मल्टीपल स्क्लेरोसिस के कुछ गंभीर मरीजों पर दवाओं का असर नहीं हो पाता। इससे उनकी समस्याएं बढ़ती ही जाती है। ऐसे मरीजों के इलाज में स्टेम सेल थेरेपी नई आशा की किरण बनकर सामने आई है। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यह प्रचलन में होगी।
हालांकि मौजूदा समय में यह तकनीक काफी महंगी है, लेकिन उम्मीद है कि आने वाले दिनों में इसमें और सुधार होगा और यह सामान्य लोगों तक उपलब्ध हो सकेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि मल्टीपल स्क्लेरोसिस एक ऐसी स्थिति है जो मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करती है। यह एक ऑटोइम्यून विकार है। इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली स्वस्थ कोशिकाओं पर ही हमला करने लगती है। यह रोग केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है। इसमें नसों को ढकने वाले मायलिन नामक सुरक्षात्मक परत को नुकसान पहुंचता है।
डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रो. डॉ आशीष दुग्गल का कहना है कि भविष्य में स्टेम सेल थेरेपी गंभीर मरीजों के लिए कारगर होगी। मौजूदा समय में इसके परिणाम बेहतर मिल रहे हैं।
दस सालों में आया काफी सुधार
डॉ. दुग्गल का कहना है कि पिछले दस सालों में इस रोग के इलाज में काफी सुधार आया है। दवा सहित दूसरे माध्यम से रोग को नियंत्रित किया जा सकता है। अधिकतर मामलों में मरीजों को दवाओं से ही राहत मिल जाती है। नई तकनीक की मदद से इस रोग की पहचान जल्द हो पा रही है। उनका कहना है कि एक लाख में करीब आठ से नौ मरीज में यह समस्या देखने को मिलती है। जिनके परिवार में यह समस्या हैं उनमें होने की आशंका अधिक होती है।
जीवन शैली में सुधार से राहत
डॉक्टरों का कहना है कि यदि रोग के मरीज स्वस्थ जीवन शैली को अपनाते हैं। डॉक्टरों की सलाह पर नियमित दवाएं लेते हैं तो वह भी सामान्य लोगों की तरह जिंदगी जी सकते हैं। डॉ. दुग्गल का कहना है कि यह रोग 15 से 50 साल के लोगों में होने की आशंका ज्यादा रहती है। युवाओं में होने की आशंका अधिक होती है। इन मरीजों का विश्लेषण बताता है कि ऐसे मरीज जिन्होंने स्वस्थ जीवन शैली अपनाई, नियमित डॉक्टरों से सलाह ली और उसी आधार पर दवाएं नियमित ली उन्हें भविष्य में किसी भी प्रकार की समस्या नहीं हुई।
रोग के लक्षण
- सुन्नता- कमजोरी
- चलने में परेशानी
- दृष्टि में बदलाव
- थकान
- मांसपेशियों में ऐंठन
यह रोग मायलिन को प्रभावित करता है। मायलिन नसों के चारों ओर एक सुरक्षात्मक परत है जो तंत्रिका संकेतों को तेजी से प्रसारित करने में मदद करती है। इस रोग में परत क्षतिग्रस्त हो जाती है, जिससे तंत्रिका संकेतों का आदान-प्रदान बाधित होता है।