देश में तेजी से बढ़ रहे मनोरोग के उपचार के लिए उपयुक्त कानून बनाने की आवश्यकता है। इसे लेकर रविवार को सांसद और मनोरोग विशेषज्ञ एक मंच पर आए। इस दौरान संसदीय कार्य उप समिति के सदस्यों ने भी मनोरोग पर अपनी बात रखी।
इंडियन साइक्रेटिक सोसायटी की इस बैठक में मनोरोग विशेषज्ञों ने बताया कि देश में हर सातवां व्यक्ति मनोरोग से पीड़ित है और 20 साल बाद यह आंकड़ा दोगुना हो जाएगा। ऐसे में इसके उपचार के लिए रणनीति बनाकर काम करना होगा। साथ ही बेहतर कानून की जरूरत होगी।
बैठक के दौरान एम्स के मनोरोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. नंद कुमार ने कहा कि देश में मनोरोग के डॉक्टरों व सुविधाओं में सुधार हुआ है, लेकिन रोगियों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। इसकी रोकथाम के लिए बड़े स्तर पर नीति बनानी होगी। वहीं सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. विनय कुमार ने कहा कि चर्चा के दौरान कई मुद्दों पर बहस हुई। जल्द ही देशभर से सुझाव लेकर केंद्र सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी जाएगी। साथ ही मांग की जाएगी कि देश में स्वास्थ्य बजट में कुछ इजाफा कर मनोरोग के तरफ विशेष ध्यान दिया जाए।
कानून में सुधार की जरूरत
चर्चा के दौरान मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2017 को लेकर चर्चा हुई। साथ ही इसमें सुधार की मांग की गई। मनोरोग विशेषज्ञों ने कहा कि इसमें ऐसे कई प्रावधान किए गए हैं जो मरीजों के उपचार में बाधा बनते हैं। इसमें कहा गया है कि यदि कोई मनोरोगी है तो उसके उपचार के लिए पहले बोर्ड के पास जाना होगा। परिवार का उसमें महत्व कम कर दिया गया है, जबकि परिवार ही सबसे पास होता है। इसके अलावा कई और प्रावधान है।
नॉन अटेंडिंग स्कूल पर लगे लगाम
सांसद जावेद अली खान ने कहा कि 80 के दशक में ट्यूशन नाम की कोई व्यवसाय नहीं था। लेकिन आज के दौर में नॉन अटेंडिंग स्कूल की मदद से कोचिंग सेंटर फल फूल रहे हैं। कोचिंग सेंटर में जाने के बाद बच्चों के पास पढ़ने के अलावा कोई अन्य काम नहीं रहता। बच्चे अपने तनाव को रिलीज नहीं कर पाते। यह बड़ी समस्या है। वहीं, सुपौल से जदयू के सांसद दिनेश्वर कामत ने कहा कि बिहार में कोचिंग सेंटर का समय बदल दिया गया है ताकि बच्चे स्कूल जाए। स्कूलों पढ़ाई से बच्चे आपसी समस्या को एक दूसरे से साझा कर लेते हैं। आने वाले दिनों में संसद में भी इस मुद्दे को उठाया जाएगा।
मनोरोग विशेषज्ञों के सुझाव पर बनाई गई है कमेटी
चर्चा में बताया गया कि मनोरोग विशेषज्ञों के सुझाव पर केंद्र सरकार ने एक कमेटी बनाई हैं। जो मनोरोग की स्थिति को देख रहे हैं। इस कमेटी को हर क्षेत्र में मनोरोग को रोकने के लिए काम करना है। वहीं देश में छात्रों के बढ़ते आत्महत्या पर चिंता व्यक्त करते हुए डॉक्टरों ने कहा कि इसके लिए नॉन अटेंडिंग स्कूल बड़ा कारण है। यह बच्चों के निराश मन को प्रोत्साहन देने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। इस तरह के स्कूलों में दाखिला लेकर बच्चे बड़े-बड़े कोचिंग सेंटरों में दाखिला तो ले लेते हैं। लेकिन जब परिणाम की बात आती है तो असफल होने वाले बच्चों आत्महत्या तक कर लेते हैं।