चमकती सड़कों, ऊंची इमारतों और आधुनिक ढांचे के बीच दिल्ली आज विकास की तेज रफ्तार पर दौड़ रही है। इसी चमक-दमक के साये में कुछ ऐसी ऐतिहासिक धरोहरें भी हैं, जो गुमनामी, उपेक्षा और बढ़ते दबाव के बीच धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती जा रही हैं। दिल्ली की तंग गलियों में स्थित रजिया सुल्तान का मकबरा आज भी इतिहास की एक अनसुनी कहानी समेटे खड़ा है।
इसी तरह पश्चिमी दिल्ली में मौजूद हस्तसल मीनार को मिनी कुतुबमीनार भी कहा जाता है, लेकिन इसके आसपास का अतिक्रमण और रखरखाव की कमी इसे धीरे-धीरे कमजोर कर रही है। वहीं, अरावली की पहाड़ियों के बीच छिपा भूली भटियारी का महल अपनी रहस्यमयी छवि के साथ आज भी खड़ा है, मगर पर्यटकों और प्रशासन दोनों की नजरों से लगभग ओझल है।
रजिया सुल्तान का मकबरा
चांदनी चौक के पास तुर्कमान गेट की संकरी गलियों में स्थित रजिया सुल्तान का मकबरा सादगी, उपेक्षा और गुमनामी का प्रतीक बन चुका है। दिल्ली सल्तनत की पहली और इकलौती महिला शासक रजिया सुल्तान, जिन्होंने 1236 से 1240 तक शासन किया, आज इतिहास के पन्नों में जितनी बड़ी हैं, जमीन पर उनकी याद उतनी ही छोटी दिखती है। यह मकबरा मोहल्ला बुलबुली खाना में एक खुले आंगन में स्थित है।
हस्तसल मीनार का मिनी कुतुब मीनार
पश्चिमी दिल्ली के भीड़भाड़ वाले इलाके में, संकरी गलियों और अनियोजित बस्तियों के बीच एक ऐतिहासिक धरोहर आज भी खड़ी है लेकिन अपनी पहचान के लिए संघर्ष करती हुई। जहां कुतुबमीनार दुनिया भर में प्रसिद्ध है, वहीं दिल्ली में मौजूद एक और मीनार हस्तसाल मीनार गुमनामी में खोती जा रही है। लाल बलुआ पत्थर और ईंटों से बनी यह तीन मंजिला संरचना एक अष्टकोणीय चबूतरे पर खड़ी है। इसमें एक संकरी सीढ़ी ऊपर तक जाती है, और एक सुरंग पास की बरादरी से जुड़ती है जो मनोरंजन कक्ष हुआ करती थी। करीब 100 मीटर दूर स्थित हाथियों का घर (हस्तसाल) इस जगह के नाम की कहानी भी बताता है, जहां कभी हाथी विश्राम करते थे। लेकिन आज यह मीनार उपेक्षा का शिकार है। न पर्यटक, न संरक्षण बस इतिहास, जो धीरे-धीरे मिटता जा रहा है।
भूली भटियारी का महल
दिल्ली के सेंट्रल रिज के घने जंगलों के बीच स्थित यह खंडहरनुमा ढांचा सिर्फ एक पुराना महल नहीं, बल्कि इतिहास, लोककथाओं और रहस्य का संगम है। यह तुगलककालीन स्थापत्य का एक उदाहरण है, जिसे मुख्यतः शिकारगाह या विश्राम स्थल के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। इसका मुख्य उपयोग शिकार के दौरान ठहरने और सुरक्षा चौकी के रूप में माना जाता है। आज इस महल का अधिकांश हिस्सा खंडहर में तब्दील हो चुका है।