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विश्व पर्यावरण स्वास्थ्य दिवस विशेष: अंधेरे में हैं आंकड़े, दिल्ली-एनसीआर में सेहत का हिसाब-किताब अधूरा

Sat, 26 Sep 2026 07:00 AM IST
दुष्यंत शर्मा संतोष कुमार, नई दिल्ली

सार

खराब हवा, दूषित पानी और शोर को लोग महसूस कर रहे हैं, लेकिन प्रदूषण के स्रोतों, उसकी व्यापकता और लोगों की सेहत पर पड़ने वाले असर से जुड़े आंकड़ों में बड़ा अंतर है।
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कुछ दिन बाद आम होंगे ये दृश्य... - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की मार हर तरफ है। खराब हवा, दूषित पानी और शोर को लोग महसूस कर रहे हैं, लेकिन प्रदूषण के स्रोतों, उसकी व्यापकता और लोगों की सेहत पर पड़ने वाले असर से जुड़े आंकड़ों में बड़ा अंतर है। विशेषज्ञों का मानना है कि शनिवार को ‘समुदायों की सुरक्षा के लिए विज्ञान के साथ खड़े होने’ की थीम पर मनाए जा रहे विश्व पर्यावरण स्वास्थ्य दिवस के मौके पर राजधानी में वैज्ञानिक आंकड़ों की कमी गंभीर सवाल खड़े करती है।

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चुनौती सिर्फ प्रदूषण से निपटने की नहीं, बल्कि उसके स्रोतों और उससे होने वाले नुकसान का पूरा हिसाब जुटाने की भी है। सवाल यह नहीं है कि दिल्ली कितनी प्रदूषित है, बल्कि यह भी है कि प्रदूषण से लोगों की सेहत को कितना नुकसान पहुंच रहा है और इसका पूरा आकलन कब होगा। क्योंकि, आंकड़ों की स्पष्ट तस्वीर के बिना प्रदूषण के खिलाफ प्रभावी नीतियां बनाना और उनके असर का आकलन करना मुश्किल है।

प्रदूषकों और स्वास्थ्य प्रभावों का एकीकृत डाटा नहीं : प्रदूषण का दूसरा बड़ा अंधेरा स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का है। हवा में पीएम 2.5, पीएम 10 और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे प्रदूषकों की निगरानी होती है, लेकिन अस्पतालों में सांस की बीमारियों, अस्थमा, हृदय रोग, स्ट्रोक और अन्य स्वास्थ्य प्रभावों का एकीकृत, नियमित और क्षेत्रवार रियल टाइम डाटा सिस्टम नहीं है। आईसीएमआर के पास राष्ट्रीय और राज्य स्तर के अध्ययन हैं, लेकिन पर्यावरणीय प्रदूषण और रोजाना सेहत पर पड़ने वाले असर का एकीकृत डैशबोर्ड नहीं है। यानी हवा का आंकड़ा अलग है और मरीजों का रिकॉर्ड अलग। दोनों के बीच संबंध की सटीक तस्वीर सामने नहीं आती।
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यमुना का आंकड़ा है, लेकिन पूरी नदी की कहानी नहीं : यमुना के पानी की निगरानी में भी आंकड़े बिखरे हुए हैं। सीपीसीबी हर महीने नदी के जल की गुणवत्ता के आंकड़े जारी करता है, लेकिन नालों के मुहाने, बारिश के बाद प्रदूषण, अलग-अलग समय पर सीवेज के प्रवाह और प्रदूषण के तत्काल स्रोतों की लगातार मैपिंग जरूरी है।

सवाल सिर्फ यह नहीं कि यमुना कितनी प्रदूषित है, बल्कि यह भी है कि किस दिन, किस हिस्से में, किस प्रदूषक और किस स्रोत के कारण प्रदूषण बढ़ा। यह इसलिए भी अहम है कि दिल्ली में यमुना खादर में सब्जियां उगाई जाती हैं। डीयू के वनस्पति विज्ञान विभाग की रिसर्च में इन सब्जियों में भारी धातुओं की मात्रा 11 से 97 गुना तक अधिक पाई गई है। हालांकि, खादर में कितनी सब्जियां उगाई जा रही हैं, उनकी आपूर्ति कहां हो रही है और उनका इस्तेमाल कौन कर रहा है, इसका समेकित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

शोर में भी आधा शहर सुनाई देता है : प्रदूषण की एक और तस्वीर ध्वनि प्रदूषण की है। दिल्ली में रीयल टाइम नॉइज मॉनिटरिंग स्टेशन मौजूद हैं, लेकिन इनकी संख्या और भौगोलिक कवरेज पूरे महानगर की वास्तविक स्थिति बताने के लिए सीमित है। सीपीसीबी के नेटवर्क में दिल्ली के 10 रीयल टाइम नॉइज मॉनिटरिंग स्टेशनों का डाटा दर्ज किया गया था। जहां निगरानी स्टेशन नहीं हैं, वहां शोर का स्तर कितना है, इसका पता नहीं चलता। बाजारों, स्कूलों, अस्पतालों, ट्रैफिक जंक्शन, रेलवे लाइनों और घनी आबादी वाले इलाकों में दिन-रात बदलते शोर की लगातार तस्वीर उपलब्ध नहीं है।

प्रदूषण में किस स्राेत का कितना योगदान...पता नहीं चलता
दिल्ली में एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग नेटवर्क लगातार हवा की स्थिति बताता है, लेकिन वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) किसी इलाके में मौजूद हर प्रदूषक और उसके स्रोत की पूरी तस्वीर नहीं देता। स्रोतवार प्रदूषण की लगातार, स्थानीय और रियल टाइम निगरानी अब भी सीमित है। एक्यूआई 500 के पार पहुंचने पर हवा की गंभीर स्थिति का पता तो चलता है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं होता कि सड़क की धूल, निर्माण कार्य, उद्योग, कचरा जलाने, वाहनों या क्षेत्रीय प्रदूषण में किस स्रोत का कितना योगदान है।
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