एक ओर सरकार बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा बुलंद कर रही है। वहीं दूसरी ओर नूंह जैसे पिछड़े जिले में बेटियों की तकनीकी शिक्षा नहीं मिल रही है। 2014 में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए दो महिला आईटीआई बनाए गए थे, लेकिन सरकार की अनदेखी के कारण आज भी बेटियों को तकनीकी शिक्षा नहीं मिल रही है।
मरोड़ा आईटीआई में ताला लगा रहता है वहीं दूसरी ओर धमाला में के आईटीआई में कर्मचारियों का अभाव है। यहां कम्प्यूटर प्रशिक्षण, बेसिक कॉस्मेटिक, सिलाई, ड्रेस मेकिंग, कम्प्यूटर एडिट पांच कोर्स शुरू किए गए थे जिनका प्रशिक्षण देने के लिए कुल 13 पद स्वीकृत किए गए थे।
इनमें से एक अनुदेशिका, क्लर्क तथा चतुर्थ श्रेणी के तीन कर्मचारी ही मौजूद हैं। कर्मचारियों के अभाव में दो कोर्स बंद किए जा चुके हैं और संसाधनों के अभाव में कई छात्राएं प्रशिक्षण पूरा होने से पहले ही संस्थान छोड़कर चली जाती हैं।
सरकार को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। अगर महिला आईटीआई में स्टाफ की कमी को पूरा किया जाता है तो इससे महिलाओं को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी। - फजरुदीन बेसर, वरिष्ठ समाजसेवी।
सरकार को ढांचा खड़ा करने से पहले उसे चलाने के लिए पूरा मंथन करना चाहिए। जिले में आईटीआई संस्थान आज स्टाफ की कमी से जूझ रहे हैं। - नूरुद्दीन नूर, वरिष्ठ अधिवक्ता नूंह।
धमाला महिला आईटीआई को सुचारू रूप से चलाने और स्टाफ की कमी को दूर करने के लिए हर बैठक में उच्चाधिकारियों से मांग की जाती है। - करुणा सैनी, अनुदेशिका, महिला आईटीआई धमाला।