अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पत्नी उच्च शिक्षित और नौकरीपेशा है, इसलिए उसे गुजारा भत्ता से वंचित नहीं किया जा सकता। यह फैसला 10 सितंबर को एक मामले में सुनाया गया, जिसमें एक सहायक प्रोफेसर जो मासिक एक लाख रुपये से अधिक कमाती हैं, अपने पति की तुलना में वित्तीय असमानता के आधार पर गुजारा भत्ता दिया गया।
न्यायमूर्ति नवीन चावला और रेनू भटनागर की खंडपीठ ने कहा कि इस प्रावधान का उद्देश्य पति-पत्नी के जीवन स्तर में समानता सुनिश्चित करना है, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर साथी को दूसरे के आर्थिक लाभ से नुकसान न हो। मामले में पति की वार्षिक आय 1.5 करोड़ रुपये से अधिक है, जबकि पत्नी की मासिक आय एक लाख रुपये से ऊपर है। परिवार न्यायालय ने पहले पत्नी के गुजारा भत्ता के दावे को खारिज कर दिया था और केवल उनकी बेटी के लिए 35,000 रुपये मासिक राहत दी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी की वित्तीय आत्मनिर्भरता को केवल शर्तों में नहीं, बल्कि विवाह के दौरान बनाए गए जीवन स्तर के सापेक्ष आंका जाना चाहिए। अदालत ने पाया कि पति की आय पत्नी से लगभग दस गुना अधिक है, जो इस असमानता को और स्पष्ट करता है। इस आधार पर अदालत ने गुजारा भत्ता की राशि को बढ़ाकर मासिक 1.5 लाख रुपये कर दिया, जो पत्नी और बच्चे दोनों के लिए संयुक्त रूप से लागू होगा। हाईकोर्ट ने कहा कि गुजारा भत्ता का निर्धारण केवल पत्नी की नौकरी या कमाई की क्षमता से नहीं, बल्कि यह देखकर किया जाना चाहिए कि क्या वह विवाह के दौरान के जीवन स्तर को बनाए रख सकती है।