जैन मुनि तरुण सागर, जिनका निधन 1 सितंबर को हुआ था। उनकी अंतिम यात्रा दिल्ली के राधे पूरी से निकाली गई, उनका अंतिम संस्कार गाजियाबाद के मुरादनगर के बसंतपुर सैतली गांव में दाह संस्कार किया गया। उनकी अंतिम यात्रा में देशभर से आए श्रद्धालु शामिल हुए थे। लेकिन पिछले तीन दिन से तरुण सागर की अंतिम विदाई का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है, जैन मुनि को डोली पर बिठाकर अंतिम यात्रा निकालने की वजह से वीडियो चर्चा में हैं। चलिए हम आपको बता दें कि क्यों जैन मुनि को डोली पर बिठाकर अंतिम यात्रा निकाली गई।
jain muni tarun sagar
- फोटो : अमर उजाला
दरअसल जैन संतों का दाह-संस्कार इस प्रक्रिया के तहत पूरा होता है। आपको बता दें कि ऐसी परंपराएं हैं अगर कोई संत समाधि या संथारा लेता है तो देह त्याग करने के बाद उसकी अंतिम यात्रा में ऐसे ही देह को समाधि की मुद्रा में ही बैठाते हैं। इसलिए इसे डोला निकालना भी कहा जाता है। जैन धर्म में परंपरा है कि यदि कोई संत समाधि की मुद्रा में देह त्याग करता है तो उसे मोक्ष भी उसी मुद्रा में मिलेगा। इसलिए जैन मुनि तरुण सागर की अंतिम यात्रा भी ऐसे ही निकाली।
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गौरतलब है कि 51 साल के जैन मुनि तरुण सागर जी का 1 सितंबर को तड़के दिल्ली के शाहदरा के कृष्णा नगर में निधन हो गया था। वो पिछले कई दिनों से पीलिया की बीमारी से ग्रसित थे। उन्हें इलाजे के लिए एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल में भर्ती जैन मुनि पर दवाओं ने भी काम करना बंद कर दिया था और उन्होंने भी अपना इलाज कराने से मना कर दिया था।
Tarun Sagar
उनकी अंतिम यात्रा दिल्ली के राधे पूरी से निकाली गयी। करीब 28 उनका अंतिम संस्कार गाजियाबाद के बसंतपुर सैतली गांव में स्थित तरुण सागरम तीर्थ में हुआ। जैन मुनि का जन्म 1967 में मध्य प्रदेश के दमोह जिले के गुंहची गांव हुआ था। उनकी मां का नाम शांतिबाई और पिता का नाम प्रताप चंद्र था।
फाइल फोटो
तरुण सागर बचपन से ही काफी धार्मिक थे। शुरू से ही धर्म में उनका काफी लगाव रहता था। बताया जा जाता है कि उन्होंने 14 साल की उम्र में ही अपना घर त्याग दिया था। वो आचार्यों के साथ रहने लगे थे।सन 1981 में ही उन्होंने अपना घर त्याग छत्तीसगढ़ में दीक्षा ली थी। तरुण मुनि अपने बयानों को लेकर हमेशा चर्चा में रहते थे। उनके निधन से न सिर्फ जैन धर्म के लोगों में दुःख है, बल्कि ये समस्त देश की क्षति है।