फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विशेषज्ञों की नजर में केजरी-जंग में कौन सही

Wed, 20 May 2015 08:24 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
विज्ञापन
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप और दिल्ली विधानसभा के पूर्व सचिव एसके शर्मा का कहना है कि केन्द्र शासित प्रदेश होने के नाते उपराज्यपाल का फैसला सर्वोपरि है। आम आदमी पार्टी की सरकार जानबूझकर वर्तमान हालात पैदा करती दिखाई पड़ रही है।
विज्ञापन


इससे पहले कई मुख्यमंत्री रहे हैं, लेकिन ऐसी स्थिति कभी नहीं आई। सुभाष कश्यप ने ‘अमर उजाला’ से बातचीत में बताया कि उपराज्यपाल के साथ अगर मुख्यमंत्री सलाह मशविरा करते तो मामला पहले ही सुलझ जाता। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बचकानी हरकत कर रहे हैं।

अदालत में जब मामला जाता है तो वकील अपने-अपने मुवक्किल के हिसाब से कानून की व्याख्या करते हैं। यही दिल्ली के मामले में हो रहा है। संविधान में उपराज्यपाल को दिल्ली के मामले में मुख्य सचिव नियुक्ति के अधिकार प्राप्त हैं।
विज्ञापन


सुभाष कश्यप बताते हैं कि उपराज्यपाल के माध्यम से दिल्ली का शासन राष्ट्रपति के पास ही होता है। उपराज्यपाल प्रतिनिधि होते हैं। मंत्रिमंडल से सलाह करनी होती है, लेकिन अंतिम फैसला उपराज्यपाल का होता है। यहां मामला उल्टा हो रहा है।
विज्ञापन

नेहरू-राजेंद्र प्रसाद के बीच भी रहा ऐसा विवाद

कैबिनेट कोई फैसला करती है तो अंतिम मुहर उपराज्यपाल को लगानी होती है, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल आदेश दे रहे हैं कि उपराज्यपाल कोई आदेश करें तो मंत्रियों की स्वीकृति लें।

सरकार संविधान, एनसीटी एक्ट और कार्य संपादन प्रक्रिया नियम से चलता है। जब तक बदलाव नहीं होता, उसकेहिसाब से चलना होगा। बदलना है तो आंदोलन करना चाहिए, उपराज्यपाल व अधिकारियों से टकराव नहीं।

सुभाष कश्यप ने बताया कि प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु के बीच भी मतभेद सामने आए थे।
गुजरात में नरेंद्र मोदी व उस समय की राज्यपाल के बीच भी मतभेद थे, लेकिन ऐसे हालात पैदा नहीं हुए। फिर राष्ट्रपति ने इन्हीं हालात को देखते हुए पहली मुलाकात में अरविंद केजरीवाल को संविधान की किताब भेंट की थी।

दिल्ली विस के पूर्व सचिव एसके शर्मा कहते हैं कि संविधान में जो लिखा है, उसकेहिसाब से उपराज्यपाल सर्वोपरि हैं। संविधान में बदलाव संसद कर सकती है। जबकि, कार्य संपादन प्रक्रिया में बदलाव राष्ट्रपति की मुहर से बिना संसद भी हो सकती है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें