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रायन हत्याकांड : इस पीढ़ी के बच्चों के बर्ताव में बदलाव का कौन है जिम्मेदार...

Fri, 10 Nov 2017 04:15 PM IST
नेहा शर्मा/अमर उजाला, नोएडा
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pradyuman thakur - फोटो : अमर उजाला
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स्कूल की छुट्टी और पेरेंट्स-टीचर मीटिंग को स्थगित कराने के लिए गुरुग्राम के रायन स्कूल में 11वीं के छात्र ने प्रद्युम्न की हत्या की थी, सीबीआई के इस खुलासे ने सभी को चौंका दिया है। अभिभावकों को यकीन नहीं हो रहा है कि कोई छात्र इस तरह से किसी का खून कर सकता है।
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सायकलॉजिस्ट का कहना है ऐसी घटनाओं के पीछे बहुत हद तक अभिभावक भी जिम्मेदार होते हैं। वह बच्चों के बर्ताव में आ रहे बदलाव के बाद भी उसे बहुत साधारण में लेते हैं। अभिभावक ये मानने को तैयार नहीं होते हैं कि उनका बच्चा मानसिक रोगी हो सकता है।   यही नहीं बच्चों पर पढ़ाई का इतना दबाव बना देते हैं कि उन्हें लगता है कि कम नंबर आने पर समाज में उनकी बेइज्जती हो जाएगी। अब अभिभावकों के पास बच्चों से बातचीत करने तक का समय नहीं होता है।
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चाइल्ड पीजीआई की सायकलॉजिस्ट डॉक्टर निहार्षि ने बताया कि ये केस हम लोगों को झकझोर देने वाला है। अभिभावकों को बच्चे से ज्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए। कई बार अभिभावक बच्चों पर अपनी इच्छाएं थोप देते हैं। बच्चों को लगता है कि अगर वह मां-बाप के सपने पूरे नहीं कर पाए, तो किसी को मुंह नहीं दिखा पाएंगे।
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ज्यादा शरारती बच्चा भी हो सकता है बीमार

pradyuman thakur - फोटो : अमर उजाला
इस वजह से बच्चे दबाव में आ जाते हैं। दबाव के चक्कर में या तो बच्चे बहुत पढ़ने लगते हैं या फिर कुछ गलत कर बैठते हैं। सोशल मीडिया से भी बच्चों पर असर पड़ता है। कई ऐसे बच्चे अस्पताल में इलाज के लिए आए हैं, जो सोशल मीडिया पर मूवी को देखकर स्कूल न जाने के लिए बहाने ढूंढते थे, काउंसलिंग के बाद ये बात सामने आई।
  उन्होंने बताया कि अस्पताल में लर्निंग डिसएबिलिटी बीमारी से ग्रस्त होकर बहुत बच्चे इलाज के लिए आ रहे हैं। इस बीमारी में बच्चे को पढ़ाई में दिक्कत होती है।

जेपी अस्पताल के बिहेवियर साइंस डिपार्टमेंट के डॉक्टर मृण्मय दास ने बताया कि अभिभावकों को बच्चों से बात जरूर करनी चाहिए और उनके मन की बात जानने की कोशिश करें, इससे बहुत हद तक समस्याएं दूर हो जाएंगी। अभिभावकों और स्कूलों को भी समझना चाहिए कि बच्चों पर इतना दबाव न बनाएं।
  कई बच्चे बहुत शरारती होते हैं। पूरे दिन इधर-उधर भागते रहते हैं। सामान को फेंकते रहते हैं। अभिभावक इसको शरारत बताकर टाल देते हैं, लेकिन ये एक बीमारी भी हो सकती है। चाइल्ड पीजीआई की डॉक्टर ने बताया कि कई बार बच्चा हाइपरएक्टिव होता है।

ऐसे बच्चे का एक जगह मन नहीं लगता है। गुस्सा भी बहुत आता है। इस तरह के बच्चे इलाज के लिए आ रहे हैं। शुरुआत में तो अभिभावक इसको बीमारी मानने को ही तैयार नहीं होते हैं। हर महीने इस तरह के 5 से 6 बच्चे इलाज के लिए आ रहे हैं। यहां तक कि अगर बच्चा बार-बार हाथ धोता है, तो वो भी बीमारी है।
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