बीते दिन हुए संघर्ष ने अटाली गांव के दामन में एक दाग लगा दिया। पुलिस प्रशासन के ढीले रवैये के कारण अराजक तत्वों को निरंकुश बना दिया।
लिहाजा, वर्षों से एक साथ रह रहे दो समुदाय के बीच धार्मिक स्थल निर्माण का विवाद आगजनी व पथराव में तब्दील हो गया। उस पर भी अब सियासी लोग वोट की मारामारी में जुटे हैं। अल्पसंख्यकों के साथ ही बहुसंख्यकों के भी अधिकांश घरों पर ताले लटके हैं।
हालांकि शांति की कोशिश में बहुसंख्यकों ने हाथ बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। अब लोगों को गांव को दंगे की दहशत से निकलने का इंतजार है। 20 दिन बाद भी दंगे की दहशत से करीब आधा गांव खाली है।
लोगों को अपना घर-गांव छोड़ कर दूसरे शहर में रिश्तेदारों के घरों को अपना ठिकाना बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा। ऐसा सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने किया, ऐसा नहीं है।
अभी भी सुनसान हैं घर
बहुसंख्यक लोग भी दंगे की पीड़ा से परेशान होकर दूसरे गांव व रिश्तेदारों की शरण में हैं। मामला शांत होने के बाद सभी लोगों के गांव लौटने की उम्मीद है। बहुसंख्यक समुदाय के करीब 20 घर सूनसान हैं। अधिकांश घरों में सिर्फ महिलाएं ही काम करती दिखती हैं।
घर पर पिछले बीस दिन से ताला लगा हुआ है। कभी-कभी आकर औरतें सफाई जरूर कर देती हैं। तेजसिंह के भरे-पूरे परिवार में से सिर्फ 70 वर्षीय मां सोना घर पर हैं। सोना इतनी बुजुर्ग हैं कि उससे चला भी नहीं जाता।
घुटने के दर्द ने उनको परेशान कर रखा है। बताया कि घर पर कोई पानी पिलाने वाला भी नहीं है। पड़ोसी के घर से खाना आ जाता है। उसी से गुजारा हो रहा है।
कवायद से नहीं मिले दिल
वीरेंद्र का घर भी बिन आदमी सूना है। तनाव को बढ़ता देख वीरेंद्र और उसके लड़के अपनी रिश्तेदारियों में शरण लिए हुए हैं।
पुलिस के कहर से बचने के लिए अधिकांश परिवार ठोकर खाने को मजबूर हैं। वहीं, दंगे के 20 दिन बाद अब गांव में तनाव का माहौल धीरे-धीरे कम हो रहा है। गलती को मानते हुए बहुसंख्यक अल्पसंख्यकों के मान-मनौव्वल में जुट गए हैं।
शनिवार सुबह मास्टर धर्मवीर, वीरचंद, मोहन, रणजीत सहित अन्य लोग गांव से बाहर अल्पसंख्यक लोगों की कॉलोनी में पहुंचे। उन्होंने लोगों को सुरक्षा देने और हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया। इस कवायद से दिल तो नहीं मिले, लेकिन उसकी शुरुआत हो चुकी है।