डेंगू के एक मरीज का किसी अन्य बीमारी का एक सप्ताह तक इलाज चलता रहा। मरीज की हालत नाजुक होने के बाद डेंगू की जांच की गई और फिर इलाज शुरू किया गया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
नतीजा यह हुआ की इलाज के दौरान ही बत्रा अस्पताल में मरीज की मौत हो गई। इस दौरान पीड़ित परिजन के साढ़े तीन लाख रुपये से ज्यादा खर्च हो गए।
मृतक हरीश (38) के भाई मुकेश चौहान ने बताया कि उल्टी, पेट में दर्द और हल्के फीवर के बाद 11 सितंबर को पटेल नगर स्थित मदन मोहन मालवीय अस्पताल ले गए लेकिन डॉक्टरों ने इंजेक्शन देकर घर जाने की सलाह दे दी।
दर-बदर भटकते रहे परिजन
इसके बाद भी सेहत में सुधार नहीं हुआ तब अगले दिन 12 सितंबर को मरीज को सफदरजंग अस्पताल इलाज के लिए ले जाया गया। मरीज को देखने के बाद डॉक्टरों ने उसे स्ट्रेचर पर लेटाकर मेडिसिन वार्ड में शिफ्ट किया।
लेकिन वहां मरीजों की संख्या और एक-एक बिस्तर पर दो से तीन मरीज देखकर हरीश के भाई मुकेश ने कहा कि उसे निजी वार्ड में रेफर कर दिया जाए। लेकिन सफदरजंग अस्पताल में कोई निजी वार्ड नहीं है।
लिहाजा परिजन उसी दिन उसे बत्रा अस्पताल लेकर चले गए। मुकेश ने बताया कि भर्ती करने से पहले 40 हजार रुपये जमा कराए गए इसके तीन बाद एक लाख रुपये जमा कराने के लिए कहा गया।
डेंगू का इलाज करते तो बच जाता हरीश
इस दौरान अस्पताल की दवा दुकान से ही डॉक्टर के कहने पर डेढ़ लाख रुपये से अधिक की दवा लाई गईं। डॉक्टरों ने कहा कि हरीश की किडनी और लिवर में दिक्कत है और संक्रमण हो गया है।
लगातार दवाई देने के बाद भी जब सुधार नहीं हुआ तब 17 सितंबर को डेंगू का टेस्ट कराया जिसमें उसकी पुष्टि भी हुई। इसके बाद डेंगू का इलाज शुरूकिया गया, लेकिन अगले ही दिन 18 सितंबर को दोपहर करीब एक बजे हरीश की मौत हो गई।
परिजनों का आरोप है कि मौत के बाद भी डेड बॉडी देने से पहले 64 हजार रुपये जमा कराने के लिए कहा गया और पैसे जमा करने के बाद ही शव को सौंपा गया। मुकेश का कहना है कि यदि समय से डेंगू का इलाज शुरू कर दिया जाता तो हरीश आज जिंदा होते।