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प्रकृति और धर्म का अनूठा संगम है चंडीगढ़

Fri, 27 Dec 2013 04:53 PM IST
अमर उजाला, दिल्ली
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वीकेंड पर चंडीगढ़ का टूर फायदे का सौदा है। यहां धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व की जगहों के साथ-साथ मनोरंजन और पिकनिक स्पॉट का पूरा पैकेज मौजूद है।
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एक ओर मनसा देवी के आशीर्वाद से मनोकामनाएं पूरी करने का मौका है तो दूसरी ओर फतेह-बुर्ज की कुतुबमिनार से भी ऊंची मीनार देखने का रोमांच। एक ओर यादविंद्रा गार्डेन के भवन मुगलकाल में ले जाते हैं तो छतबीड़ जू की बैटरी से चलने वाली फैरी पर बैठकर घूमने का अपना ही मजा है।

नई दिल्ली से 266 किलोमीटर दूर चंडीगढ़ पहुंचने में करीब पांच घंटे का वक्त लगता है। यहां के लिए श्रेणी के अनुसार करीब 11 सौ से 6 सौ रुपये तक के खर्च पर पहुंचा जा सकता है। साथ ही कार भी बुक कराई जा सकती है। इसके लिए करीब 22 सौ रुपये खर्च करने पड़ेंगे।
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ये चारों मनमोहक स्थान चंडीगढ़ सिटी के आस-पास 20-25 किलोमीटर की रेंज में हैं। इसलिए यह भी संभव है कि आप दिनभ्ार यहां सैर करने के बाद शाम को चंडीगढ़ वापस लौट आएं। फिर अगले दिन सुबह दूसरे गंतव्य के लिए निकल जाएं।

पंचकूला स्थित मनसा देवी मंदिर की दूरी चंडीगढ़ से 10 किलोमीटर है। रेलवे स्टेशन या बस स्टॉप दोनों से यहां जाने के लिए हमेशा साधन उपलब्ध रहते हैं। यादविंद्रा गार्डेन, चंडीगढ़ से 23 किलोमीटर दूर है। यहां पहुंचने के लिए साधनों की कमी नहीं है।

चप्पड़चिड़ी स्थित बाबा बंदा सिंह बहादुर जंगी यादगार का फातेह-बुर्ज भी चंडीगढ़ से 10 किलोमीटर की रेंज के भीतर है। छतबीड़ जू की चंडीगढ़ की दूरी 9 किलोमीटर है। इन दोनों स्थानों पर पहुंचने के लिए भी चंडीगढ़ से कई छोटे-बड़े साधन हैं।

छतबीड़ जू यानी पिकनिक का पूरा इंतजाम
छतबीड़ जू देश के प्रमुख चिड़ियाघरों में से एक है। चंडीगढ़ से 15 किलोमीटर के फासले पर स्थित इस जू को देखने रोजाना सैकड़ों लोग आते हैं।

चंडीगढ़-पटियाला रोड पर बना जानवरों का यह घरौंदा करीब दो सौ एकड़ में फैला है। 1977 में बने इस जू का नाम पंजाब के पूर्व राज्यपाल महिंदर चौधरी के नाम पर रखा गया था।

चारों तरफ से हरे-भरे पेड़ों से घिरे इस जू में करीब 950 किस्मों के पशु-पक्षी हैं। इनमें भालू, हाथी, बंगाल टाइगर, घड़ियाल, मगरमच्छ, शेर, चीता, जेब्रा, हिरन व चितकारा आकर्षण का केंद्र हैं।

लॉयन सफारी और हिरन सफारी यहां आकर्षण का केंद्र हैं। लॉयन सफारी में जाने के लिए स्पेशल बस है। हिरन सफारी में बैटरी से चलने वाली फैरी के जरिए आनंद उठाया जाता है। यह जू के अंदर ही उपलब्ध हो जाती हैं। पिकनिक के लिए आए हैं तो यहां की झील के किनारे बैठकर घर के बने खाने का लुत्फ लीजिए।

वरना अंदर दो कैंटीन भी हैं। जू में वेटरिनरी स्टूडेंट्स के लिए रिसर्च सेंटर और पशुओं के लिए अस्पताल व आईसीयू है। यहां आसपास से पकड़े गए जानवरों का भी इलाज किया जाता है। यहां रैप्टाइल हाउस बनाया गया है और गिद्धों का प्रजनन केंद्र भी है।

हर मनोकामना पूरी करती हैं मनसा देवी

शिवालिक की पहाड़ियों से कुरुक्षेत्र के बी 48 कोस के सिंधु वन में ऋषि-मुनियों ने पुराणों की रचना की थी। सिन्धुवन के ही अतिंम छोर पर प्राकृतिक छटाओं से आच्छादित एक मनोरम एवं शांति वातावरण में स्थित है सतयुगी सिद्ध माता मनसा देवी का मंदिर।

यहां ऐसी मान्यता है कि सच्चे मन से 40 दिन तक लगातार देवी भवन पहुंच कर पूजा करने वाले की मनोकामना पूरी हो जाती है। मनसा देवी के प्रकट होने का उल्लेख शिव पुराण में भी मिलता है।

वहीं एक मान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि पांडवों ने बनवास के समय मनसा देवी मंदिर में देवी आराधाना की थी। इन्हीं दिनों में भगवान श्रीकृष्ण के भी इस क्षेत्र में आने के प्रमाण मिलते हैं।

कुतुब-मीनार से भी ऊंचा है फतेह-बुर्ज

मोहाली के नजदीक गांव चप्पड़चिड़ी की फिजाओं बसा बाबा बंदा सिंह बहादुर जंगी यादगार बहादुरी की दास्तां बयांकरता है। बंदा सिंह बहादुर ने यहां काश्तकारों की जमीन मुक्त कराने के लिए लड़ाइयां लड़ी थीं।

उन्हीं की याद में राज्य सरकार ने चप्पड़चिड़ी यादगार को एक टूरिस्ट स्पॉट के रूप में विकसित किया। यहां की सबसे बड़ी खासियत विशाल फतेह-बुर्ज है, जोकि कुतुब-मीनार से भी ऊंचा है और देश का सबसे बड़ा टावर है।

इसमें लिफ्ट लगने का काम भी जल्द पूरा हो जाएगा, जिसके बाद आप ऊपर से नीचे की दुनिया देख सकेंगे। बीस एकड़ वाले गई इस यादगार में बाबा बंदा सिंह बहादुर और उनके पांच जरनैलों के विशाल बुत हैं, जिन्हें छोटी-छोटी पहाड़ियों पर स्थापित किया गया है।

एक ओपन एयर थिएटर है और कैफेटेरिया भी है। इसके दरवाजे आदि पुराने स्टाइल में बनाए गए हैं, जो इसे हेरिटेज लुक देते हैं। यहां एक वाटर बॉडी है, जिसमें बुर्ज व बुतों की आकर्षक छवियां दिखती हैं।

रात को लाइटिंग के बाद यहां का नजारा ही अलग होता है। टूरिज्म विभाग द्वारा यहां पुरुष व महिला गाइड नियुक्त किए हैं। जोकि आने वालों को ऐतिहासिक विरासत से रूबरू कराते हैं। रोजाना यहां करीब पांच सौ टूरिस्ट आ रहे हैं। वीकेंड पर संख्या एक हजार तक भी पहुंच जाती है।

मुगल शैली का नमूना है यादविंद्रा गार्डेन
हरियाणा और पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ से 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यादविंद्रा गार्डन पर्यटकों के लिए खास आकर्षण है।

औरंगजेब के शासन काल में बने इस खूबसूरत गार्डन का नाम पटियाला के महाराज यादविन्द्र सिंह के नाम पर है। आर्किटेक्ट नवाब फिदाई खान की ओर से तैयार इस गार्डन में मुगल शैली का बेहतरीन नमूना देखने को मिलता है।

इस बाग में सात टैरेस हैं। पहली टेरेस में राजस्थानी मुगल शैली में निर्मित एक शीशमहल है जो हवामहल से जुड़ता हुआ है। इससे आगे चलें तो दूसरी टेरेस पर रंग महल है और फिर अगली छत पर फूलों का बागीचा है।
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गार्डन में जल महल का भी निर्माण किया गया है जिसके चारों ओर फव्वारे लगे हैं। गार्डन के आखिर में ओपन थियेटर है, हर खास मौकों पर रंगारंग कार्यक्रम करवाए जाते हैं।
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