दिल्ली सीमा पर डटे किसानों ने रणनीतिक तौर पर बेहद अहम वक्त का चुनाव किया है। इस समय पंजाब के ज्यादातर हिस्से में रबी फसलों की बुआई हो चुकी है। इसकी सिंचाई आदि से जुड़े काम शेष हैं, लेकिन इसमें अभी थोड़ा समय लगेगा। ऐसे में किसानों को खेती की ज्यादा फिक्र नहीं है। वहीं, संघर्ष की राह पर चल पड़े किसानों ने परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी बच्चों और महिला सदस्यों को दे रखी है। फिर, मोबाइल से संपर्क भी बना हुआ है। यही वजह है कि सिंघु व टीकरी बॉर्डर पर किसान छह महीने तक डटे रहने का दावा कर रहे हैं।
तरनतारन से दोआबा से सिंघु बॉर्डर पर पहुंचे जगबीर सिंह बताते हैं कि उनका बड़ा बेटा कनाडा में रहता है। जबकि छोटे बेटे व पत्नी के साथ वह खेती किसानी करते हैं। घर में मां व पिताजी भी हैं। पंजाब से चलते वक्त उन्होंने परिवार का जिम्मा अपने छोटे बेटे पर छोड़ दिया है। इसके लिए उसको जरूरी हिदायत भी दे दी है। ऐसे में घर में कोई दिक्कत नहीं होगी।
तरनतारन के ही सतिंदर सिंह का कहना है कि रबी की बुआई का काम पूरा हो गया है। अब खेत की सिंचाई करनी है। इसमें भी अभी वक्त है। इसका जिम्मा खेत पर काम करने वालों का सौंप दिया है। वह सिंचाई का काम वक्त आने पर कर लेंगे। ऐसे में अपने हक की लड़ाई लड़ने में उनको अपनी किसानी और परिवार की फिक्र यहां नहीं है। लड़ाई जितनी भी लंबी चले, वह बगैर हक लिए वापस नहीं लौटेंगे।
मुक्तसर के जगमीत सिंह का कहना है कि खेती तभी बचेगी, जब सरकार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देगी। तीनों कानून किसानों की रीढ़ तोड़ देंगे। ऐसे में जितना जरूरी खेती करना है, उतना ही तीनों कानूनों से लड़ना भी। वैसे भी, इस वक्त रबी की बुआई का काम पूरा हो गया है। किसान अपनी लड़ाई आगे बढ़ाने के लिए चिंतामुक्त है। भले ही संघर्ष लंबा चले। बरनाला के गुरनाम सिंह का कहना है कि खेती का काम भी हो गया है और परिवार की भी चिंता नहीं है। यही वजह है कि हम अपनी लड़ाई लड़ने के लिएदिल्ली पहुंच गए हैं। बगैर अपना हक लिए वापस लौटने का हमारा कोई इरादा नहीं है।