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मम्मा के साथ हम घर रह सकते थे, लेकिन यहां अपना हक लेने आए हैं...

Wed, 02 Dec 2020 04:55 AM IST
दुष्यंत शर्मा सर्वेश कुमार, नई दिल्ली

सार

  • बच्चों के साथ किसान आंदोलन में महिलाएं भी शामिल
  • हक की लड़ाई में सड़क पर सेंक रही हैं रोटियां
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होशियारपुर से आई गुरमीत... - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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हम यहां इसलिए नहीं आए है कि घर पर कोई नहीं है। हम अपना हक लेने आए हैं। तीन काले कानून रद्द होने से पहले हम वापस भी नहीं जाएंगे। गुनगुनी धूप में किताब के पन्ने पलट रही छठी की छात्रा गुरमीत कौर ने आंदोलन में शामिल होने के सवाल पर सीधा-सीधा जवाब दिया। इसके बाद उसने अपने हिसाब से तीनों कानूनों की खामियों को सिलसिलेवार ढंग से गिनाया। साथ ही सवाल किया कि यह कैसा कानून है कि जो किसान को कानून तोड़ने पर सजा देता है, लेकिन कंपनियों को नहीं। गुरमीत कौर बताती है कि हम अनपढ़ नहीं है, बस इसका पता सरकार को चल जाना चाहिए।

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पंजाब से अपने घर पर ताला लगाकर आईं कई महिलाएं सिंघु बार्डर पर पहुंचीं हैं। जबकि कइयों ने घर की देखभाल का जिम्मा अपने रिश्तेदारों को दे रखा है। अपनी मम्मी-पापा के साथ आंदोलन में शामिल गुरमीत के घर पर ताला लगा है। पंजाब से आई बलकीत कौर ने कहा कि नए कानून से किसानों को फसलों की उचित कीमत नहीं मिलेगी, इससे बच्चों के लिए मुश्किलें काफी बढ़ जाएंगी। अपने परिवार के भविष्य और किसानों के हक के समर्थन में वह यहां आई हैं।

संगरूर निवासी रणजीत कौर ने कहा कि जब फसल पैदा करने वाले ही रो रहे हैं तो हम उनका साथ क्यों नहीं देंगी। घर के अन्य सदस्यों के लिए खाने पीने की दिक्कत के बारे में कहा कि बहू और बेटियां हैं जो सभी के लिए खाना बना रही हैं। खेती में भी सभी मिलजुलकर काम कर रहे हैं। अपनी खेती बचाने के लिए हम अपना आलीशान मकान छोड़कर सड़क पर रोटिंया सेंक रहे हैं। हरविंदर कौर ने कहा है कि हमारे यहां जब रिश्ता होता है तो देखा जाता है कि जमीन कितनी है और खेती-किसानी कैसी होती है। इसके बगैर किसी का कोई वजूद नहीं है। 
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जबकि सरकारी कानून किसानों की रीढ़ तोड़ने वाला है। ऐसे में घर बैठने से फायदा क्या। हम अपनी जमीन, अपनी मां को बचाने के लिए निकल पड़े हैं और बगैर आश्वस्त हुए वापस भी नहीं लौटेंगे। किसान नेता बूटा सिंह ने कहा कि आंदोलन में महिलाएं भी शामिल हो रही हैं। रही बात कि घर के अन्य सदस्यों के लिए रोटियां कौन बनाएगा तो सभी के बेहतर भविष्य के लिए इतनी कुर्बानी तो कुछ नहीं।

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रबी की बुआई करके संघर्ष के लिए निकले किसान

दिल्ली सीमा पर डटे किसानों ने रणनीतिक तौर पर बेहद अहम वक्त का चुनाव किया है। इस समय पंजाब के ज्यादातर हिस्से में रबी फसलों की बुआई हो चुकी है। इसकी सिंचाई आदि से जुड़े काम शेष हैं, लेकिन इसमें अभी थोड़ा समय लगेगा। ऐसे में किसानों को खेती की ज्यादा फिक्र नहीं है। वहीं, संघर्ष की राह पर चल पड़े किसानों ने परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी बच्चों और महिला सदस्यों को दे रखी है। फिर, मोबाइल से संपर्क भी बना हुआ है। यही वजह है कि सिंघु व टीकरी बॉर्डर पर किसान छह महीने तक डटे रहने का दावा कर रहे हैं।

तरनतारन से दोआबा से सिंघु बॉर्डर पर पहुंचे जगबीर सिंह बताते हैं कि उनका बड़ा बेटा कनाडा में रहता है। जबकि छोटे बेटे व पत्नी के साथ वह खेती किसानी करते हैं। घर में मां व पिताजी भी हैं। पंजाब से चलते वक्त उन्होंने परिवार का जिम्मा अपने छोटे बेटे पर छोड़ दिया है। इसके लिए उसको जरूरी हिदायत भी दे दी है। ऐसे में घर में कोई दिक्कत नहीं होगी।

तरनतारन के ही सतिंदर सिंह का कहना है कि रबी की बुआई का काम पूरा हो गया है। अब खेत की सिंचाई करनी है। इसमें भी अभी वक्त है। इसका जिम्मा खेत पर काम करने वालों का सौंप दिया है। वह सिंचाई का काम वक्त आने पर कर लेंगे। ऐसे में अपने हक की लड़ाई लड़ने में उनको अपनी किसानी और परिवार की फिक्र यहां नहीं है। लड़ाई जितनी भी लंबी चले, वह बगैर हक लिए वापस नहीं लौटेंगे।

मुक्तसर के जगमीत सिंह का कहना है कि खेती तभी बचेगी, जब सरकार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देगी। तीनों कानून किसानों की रीढ़ तोड़ देंगे। ऐसे में जितना जरूरी खेती करना है, उतना ही तीनों कानूनों से लड़ना भी। वैसे भी, इस वक्त रबी की बुआई का काम पूरा हो गया है। किसान अपनी लड़ाई आगे बढ़ाने के लिए चिंतामुक्त है। भले ही संघर्ष लंबा चले। बरनाला के गुरनाम सिंह का कहना है कि खेती का काम भी हो गया है और परिवार की भी चिंता नहीं है। यही वजह है कि हम अपनी लड़ाई लड़ने के लिएदिल्ली पहुंच गए हैं। बगैर अपना हक लिए वापस लौटने का हमारा कोई इरादा नहीं है। 
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