जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है, राजनीतिक दल अपने चुनावी गुणा-गणित को दुरुस्त करने में जुट गए हैं। वैसे तो शहरी मतदाताओं का रुख समझ पाना हमेशा से कठिन रहा है, लेकिन इस बार ग्रामीण मतदाताओं की खामोशी भी राजनीतिक दलों की बेचैनी बढ़ा रही है।
बीते विधानसभा चुनाव से सबक लेते हुए इस बार ग्रामीण क्षेत्रों पर राजनीतिक दलों का फोकस बढ़ने लगा है। टिकट की दौड़ में बाजी मारने के बाद सभी बड़े राजनीतिक दलों के प्रत्याशी अब चुनावी समर की तैयारियों में जुट गए हैं।
यह भी पढ़ें:बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है AAP
हालांकि शहरी क्षेत्र में चुनावी अभियान का ज्यादा असर नहीं है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्याशियों ने डोर टू डोर संपर्क साधना शुरू कर दिया है। पहले चुनाव प्रचार के दौरान ग्रामीणों का झुंड अपने समर्थित प्रत्याशियों के आगे-पीछे घूमता था, लेकिन इस बार गांवों में चुनावी चर्चा के लिए न तो चौपालें सज रही हैं और न ही सड़क किनारे या फिर पेड़ के नीचे जमा लोग चुनावी बहस करते दिख रहे हैं।
इसे चुनाव आयोग की सख्ती का असर भी कहा जा सकता है या फिर ग्रामीण मतदाताओं का बदलता नजरिया मान सकते हैं। लेकिन ग्रामीण मतदाताओं की खामोशी ने राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों की धड़कनों को बढ़ाकर रख दिया है। इस बार चुनावी गणित किसके पक्ष में जाएगा और किसका खेल बिगाड़ेगा। इस स्थिति को भांप पाना प्रत्याशियों के लिए बेहद मुश्किल साबित हो रहा है।
पिछले नतीजों से ले रहे सबक
दो साल पहले हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों से सबक लेकर प्रत्याशी चुनावी जंग जीतने की रणनीति बनाने में जुटे हैं। विधानसभा चुनाव में खुर्जा विधानसभा क्षेत्र का मतदान प्रतिशत सबसे ज्यादा था। इस विधानसभा क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा ग्रामीण है। मतदान प्रतिशत में जेवर दूसरे, सिकंदराबाद तीसरे और दादरी चौथे पायदान पर था। इन तीनों विधानसभाओं में भी ग्रामीण मतदाता सबसे ज्यादा हैं। जबकि नोएडा का मतदान प्रतिशत सबसे कम रहा। ऐसे में पांचों विधानसभाओं के नतीजों का विश्लेषण कर प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतर रहे हैं।