नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो एक्ट) के तहत दर्ज अपराध को पीड़िता या उसके परिवार के साथ समझौते के आधार पर सुलझाया नहीं जा सकता। न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार करते हुए यह टिप्पणी की। लगभग 49 वर्षीय याचिकाकर्ता ने पीड़िता के परिवार की मध्यस्थता से हुए समझौते पर एफआईआर और संबंधित कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी।
अदालत ने कहा कि आरोप बच्चे के साथ विश्वास या अधिकार की स्थिति वाले व्यक्ति द्वारा गंभीर भेदक यौन हमले से संबंधित हैं। ऐसे अपराध जघन्य प्रकृति के होते हैं और समाज पर गंभीर प्रभाव डालते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के जियान सिंह बनाम पंजाब राज्य के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने दोहराया कि उच्च न्यायालय को समझौते के आधार पर आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की अंतर्निहित शक्ति है, लेकिन मानसिक विकृति या यौन अपराध जैसे जघन्य और गंभीर मामलों में इसका प्रयोग नहीं किया जा सकता।