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निर्भया फिर जीती न्याय की जंग पर दोषियों की सजा के अमल पर संशय

Tue, 10 Jul 2018 11:51 AM IST
विजय सिंघल, अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : अमर उजाला
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वंसत विहार गैंगरेप मामले में साढ़े पांच वर्ष की लंबी लड़ाई के बाद आखिर पीड़िता को न्याय मिल ही गया। सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर दोषियों  को फांसी की सजा पर अपनी मुहर लग दी।

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इस फैसले से पीड़िता के माता-पिता के अलावा आमजन में खुशी का माहौल है, बावजूद इसके सजा पाए चारों दोषी कब फांसी पर चढ़ेंगे इस पर संशय बरकरार है। दरअसल दोषियों के पास अभी भी सजा पर अमल को रुकवाने के कई विकल्प हैं।

उनके पास पुन: सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के अलावा राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर करने का अधिकार है और यदि उनकी दया याचिका खारिज होती है तो वे पुन: अदालत का भी दरवाजा खटखटा सकते हैं।  
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16 दिसंबर 2012 को हुई इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। आरोपियों को सितंबर 2013 को फांसी की सजा सुनाई गई थी, लेकिन वे कानून की खामियों का फायदा उठाते हुए बार-बार सजा पर अमल को रुकवाने में कामयाब हो रहे हैं।

भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने अपने मुख्य फैसले के बाद उनकी पुनर्विचार याचिका को एक वर्ष बाद फिर खारिज कर दिया, लेकिन उनके पास कई विकल्प हैं जिससे इस बात पर संशय बरकरार है कि देश के सबसे जघन्य अपराध में लिप्त दोषी जल्द फांसी पर लटक जाएंगे। 

दरअसल दोषी विनय शर्मा, मुकेश व पवन ने ही पुनर्विचार याचिका दायर की थी। चौथे दोषी अक्षय कुमार ने पारिवारिक स्थिति का सहारा लेकर पुनर्विचार याचिका दायर ही नहीं की थी। दोषियों के वकील एपी सिंह ने जिस प्रकार से अपनी प्रतिक्रिया दी है उससे स्पष्ट है कि वे एक के बाद एक याचिका दायर करेंगे।

अब भी दोषियों के पास सर्वोच्च न्यायालय में पुन: अंतिम प्रयास के तहत क्युरेटिव याचिका दायर करने का अधिकार है। हालांकि इस याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय में बंद कमरे में सुनवाई होगी। यदि यह याचिका भी खारिज हो जाती है तो उनके पास राष्ट्रपति के पास याचिका दायर करने का अधिकार है।  

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राष्ट्रपति के पास भी लग सकती है देरी

nirbhaya case
वर्तमान में राष्ट्रपति के पास दर्जनों याचिका लंबित है और ऐसी आशा भी नहीं है कि वे इन दोषियों की याचिका पर पहले निर्णय ले। यानि स्पष्ट है कि राष्ट्रपति के पास भी याचिका का निपटारा होने में काफी समय लग जाएगा।

राष्ट्रपति के पास से दया याचिका खारिज होने के तकनीकी आधार का तर्क देकर दोषी पुन: अदालत में जा सकते हैं। निचली व हाईकोर्ट में हुआ जल्द फैसला सर्वोच्च न्यायालय में अटका इस मामले में लोगों की भावनाओं को देख यौन शोषण के मामलों के निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन हुआ व सुनवाई साकेत कोर्ट में प्रति दिन चली। दोषियों व उनके वकीलों के रवैये, 80 से ज्यादा गवाहों इत्यादि के कारण निचली अदालत में फैसले को नौ माह लग गए।

इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने 9 महीने में 80 से ज्यादा गवाह, 130 सुनवाई के बाद 13 सितंबर 2013 को आरोपी विनय शर्मा, अक्षय ठाकुर, मुकेश व पवन को फांसी की सजा सुना फाइल हाईकोर्ट में भेज दी थी।

पांचवें आरोपी राम सिंह ने 11 मार्च 2013 को तिहाड़ जेल में आत्महत्या कर ली थी।  दोषियों को सुनाई गई फांसी की सजा की पुष्टी की फाइल हाईकोर्ट में पहुंची। हाईकोर्ट ने तुंरत संज्ञान लेकर 23 सितंबर को ही दोषियों से जबाव तलब कर लिया। हाईकोर्ट ने दिन-प्रतिदिन के आधार पर सुनवाई कर मात्र छह माह में ही अपील का निपटारा कर ट्रायल कोर्ट के फैसले को बहाल रखा।

हाईकोर्ट ने अपना फैसला 13 मार्च 2014 को दिया। दोषी मुकेश व पवन ने 15 मार्च 2014 को सर्वोच्च न्यायालय में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दे दी। वहीं विनय व अक्षय ठाकुर ने जुलाई में अपील दायर की।

सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी अपील को स्वीकार करते हुए फांसी की सजा पर रोक लगा दी। सर्वोच्च न्यायालय में करीब दो वर्ष बाद 4 अप्रैल 2016 को सुनवाई शुरु हुई व 28 अप्रैल को सुनवाई के लिए तीन सदस्यीय खंडपीठ का गठन हुआ।

नियमित सुनवाई जनवरी 2017 से शुरू हुई। न्यायालय ने 5 मई 2017 को दोषियों को फांसी की सजा को बरकरार रखा। इसके बाद उन्होंने पुनर्विचार याचिका दायर कर दी, जिसके फैसले में भी एक वर्ष से ज्यादा समय लग गया।
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