वर्तमान में राष्ट्रपति के पास दर्जनों याचिका लंबित है और ऐसी आशा भी नहीं है कि वे इन दोषियों की याचिका पर पहले निर्णय ले। यानि स्पष्ट है कि राष्ट्रपति के पास भी याचिका का निपटारा होने में काफी समय लग जाएगा।
राष्ट्रपति के पास से दया याचिका खारिज होने के तकनीकी आधार का तर्क देकर दोषी पुन: अदालत में जा सकते हैं। निचली व हाईकोर्ट में हुआ जल्द फैसला सर्वोच्च न्यायालय में अटका इस मामले में लोगों की भावनाओं को देख यौन शोषण के मामलों के निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन हुआ व सुनवाई साकेत कोर्ट में प्रति दिन चली। दोषियों व उनके वकीलों के रवैये, 80 से ज्यादा गवाहों इत्यादि के कारण निचली अदालत में फैसले को नौ माह लग गए।
इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने 9 महीने में 80 से ज्यादा गवाह, 130 सुनवाई के बाद 13 सितंबर 2013 को आरोपी विनय शर्मा, अक्षय ठाकुर, मुकेश व पवन को फांसी की सजा सुना फाइल हाईकोर्ट में भेज दी थी।
पांचवें आरोपी राम सिंह ने 11 मार्च 2013 को तिहाड़ जेल में आत्महत्या कर ली थी। दोषियों को सुनाई गई फांसी की सजा की पुष्टी की फाइल हाईकोर्ट में पहुंची। हाईकोर्ट ने तुंरत संज्ञान लेकर 23 सितंबर को ही दोषियों से जबाव तलब कर लिया। हाईकोर्ट ने दिन-प्रतिदिन के आधार पर सुनवाई कर मात्र छह माह में ही अपील का निपटारा कर ट्रायल कोर्ट के फैसले को बहाल रखा।
हाईकोर्ट ने अपना फैसला 13 मार्च 2014 को दिया। दोषी मुकेश व पवन ने 15 मार्च 2014 को सर्वोच्च न्यायालय में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दे दी। वहीं विनय व अक्षय ठाकुर ने जुलाई में अपील दायर की।
सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी अपील को स्वीकार करते हुए फांसी की सजा पर रोक लगा दी। सर्वोच्च न्यायालय में करीब दो वर्ष बाद 4 अप्रैल 2016 को सुनवाई शुरु हुई व 28 अप्रैल को सुनवाई के लिए तीन सदस्यीय खंडपीठ का गठन हुआ।
नियमित सुनवाई जनवरी 2017 से शुरू हुई। न्यायालय ने 5 मई 2017 को दोषियों को फांसी की सजा को बरकरार रखा। इसके बाद उन्होंने पुनर्विचार याचिका दायर कर दी, जिसके फैसले में भी एक वर्ष से ज्यादा समय लग गया।