टीबी जांच के लिए जो टेस्ट किया वो बैन था
शिकायतकर्ता ने फोरम को बताया कि मानसिक रूप से परेशान होकर उन्हाेंने एक अन्य डॉक्टर को यह केस दिखाया, जिन्हाेंने बताया कि इडोमीट्रम टीबी की जांच के लिए पीएएमपी सही टेस्ट नहीं है, इसे डब्ल्यूएचओ बैन कर चुका है। यह भी सामने आया कि गर्भस्थ शिशु का विकास नहीं हो रहा है, क्योंकि वे टीबी की दवाएं ले रही थीं। अंतत: गर्भस्थ शिशु को भी बचाया नहीं जा सका।
इसके बाद उन्हाेंने फोर्टिस ले-फेम अस्पताल की डॉ. नीना सिंह से इलाज करवाया। लेकिन यहां भी गलत सर्जरी के चलते वे हमेशा के लिए निसंतान होते-होते बचे। उन्हाेंने डॉ. सिंह के अस्पताल से संपर्क किया तो उसने भी कोई मदद नहीं की, बल्कि डॉक्टर की ही बात मानने के लिए कहा। परिणाम यह हुआ कि पीड़ित महिला आज एशरमैन सिंड्रोम से पीड़ित है। बड़ी मुश्किल से एक अन्य चिकित्सक की सहायता से वे बच्चा पैदा कर सके।
45 दिन में हर्जाना दें दोषी डॉक्टर
फोरम ने दोनों चिकित्सकों और अस्पतालों को लापरवाही का दोषी माना। उन्हें याची को अस्पताल, जांच व दवाओं के खर्च का पांच लाख रुपये अदा करने के लिए कहा गया। 10-10 लाख हर्जाना भी पीड़िता को देने के लिए कहा गया है। दोषियों को कानूनी खर्च के 50 हजार रुपये भी अदा करने को कहा है। 45 दिन में यह रकम नहीं चुकाते हैं तो उन्हें भुगतान की तिथि पर नौ फीसदी ब्याज भी चुकाना होगा।