पहले समूह के मरीजों को केवल कैंसर की दवाई दी जा रही है। जबकि दूसरे समूह के मरीजों को दवाई के साथ त्रिफला भी दिया जाता है। यह अध्ययन लंबे समय तक चलेगा, लेकिन शुरूआती दौर में ही देखा गया है कि जिन मरीजों को दवाई के साथ त्रिफला भी दिया गया, उनमें तेजी से सुधार हो रहा है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली के दूसरे रिसर्च डे के अवसर पर बायोकेमेस्ट्री विभाग की सीनियर रेजिडेंट डॉ. निधी गुप्ता ने जानकारी दी कि विभाग ने त्रिफला के अध्ययन के लिए लैब में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनाई गई कोशिकाओं के नौ ग्रुप बनाए। सभी ग्रुप में दो-दो लाख कोशिकाओं को रखा गया।
पहले ग्रुप की कोशिकाओं को केवल त्रिफला के साथ रखा गया। दूसरे ग्रुप को कैंसर की दवाई और तीसरे ग्रुप को दवाई के साथ त्रिफला में रखा गया। इन तीनों की तरह ही डोज को कम-ज्यादा कर छह और ग्रुप बनाए गए। करीब दो माह तक लैब में यह अध्ययन चला।
इस दौरान पता चला कि दो दिन तक तय किए गए डोज के साथ रखे गए कोशिकाओं में अंतर आ रहा है। जिन कोशिकाओं को दवाई और त्रिफला के साथ दो दिन तक रखा गया उनमें मृत कोशिकाओं की संख्या कम रहीं, उनमें ज्यादा सुधार था।
क्या दिखा फायदा
दवाई के साथ त्रिफला देने से मरीज में कीमोथेरेपी के बाद उल्टी स्वाद में बदलाव, कब्ज की शिकायत, धूप से परेशानी, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली, तनाव आदि साइड इफेक्ट में काफी सुधार पाया गया। साथ ही कैंसर से रिकवरी की गति में तेजी देखी गई है।
बढ़ेगा अध्ययन का दायरा
कैंसर मरीजों पर त्रिफला के प्रभाव को जानने के लिए अध्ययन का स्तर बढ़ेगा। अभी 10 मरीजों पर अध्ययन किया जा रहा है। इसमें एक ग्रुप को केवल दवाई दी जा रही है, जबकि दूसरे ग्रुप को दवाई के साथ त्रिफला भी दिया जा रहा है। सूत्रों की माने तो अध्ययन में मरीजों की संख्या बढ़ाई जाएगी। अभी तक परिणाम काफी बेहतर मिले है। पायलट प्रोजेक्ट के तहत चल रहे इस अध्ययन को विस्तार देने की तैयारी की जा रही है। आने वाले दिनों में अध्ययन के बाद बड़े स्तर पर जांच की जा सकेगी।
यह है त्रिफला
त्रिफला एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक रासायनिक फ़ॉर्मूला है। इसमें अमलकी (आंवला), बिभीतक (बहेडा) और हरितकी (हरड़ के बीज निकाल कर) मिश्रण तैयार किया जाता है। इसमें एक भाग हरड का, दो भाग बहेड़ा का और तीन भाग आंवला का होता है। इसे उक्त मात्रा में मिलाकर मिश्रण तैयार किया जाता है।