बता दें कि मेडिकल क्षेत्र में सुधार के लिए एमसीआई की जगह एनएमसी बनाने के लिए एक समिति बनाई गई थी, समिति की रिपोर्ट के बाद एनएमसी बिल तैयार किया गया। दिसंबर-2017 में इसे लोकसभा में पेश किया गया था। बिल के कुछ प्रावधानों पर निजी क्षेत्र के चिकित्सकों और एग्जिट एग्जाम पर स्टूडेंट्स को आपत्ति थी इसके बाद बिल को पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी को भेज दिया गया था।
जहां विभिन्न संगठन, सरकार और एमसीआई से चर्चा के बाद 136 पन्नों की संशोधन रिपोर्ट तैयार की है। लेकिन डॉक्टरों ने इस रिपोर्ट को नकार दिया है।
समिति की रिपोर्ट आने के बाद इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रवि वानखेड़कर ने कहा कि जिन बिंदुओं पर संशोधन की मांग रखी गई थी। स्थायी समिति ने उनमें से कई बिंदुओं पर संशोधन नहीं किया है। 25 मार्च को दिल्ली में देश भर के लाखों डॉक्टरों की महापंचायत होने वाली है। उसी में स्थायी समिति की इन सिफारिशों को लेकर डॉक्टर फैसला करेंगे। उन्होंने इस रिपोर्ट पर संतुष्टि नहीं जताई है।
नियमों को ही समिति ने घुमा दिया
फेडरेशन ऑफ रेजीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (फोर्डा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विवेक चौकसे ने बताया कि एनएमसी बिल के खिलाफ लगातार विरोध चल रहा है। एमबीबीएस के बाद एनएलई परीक्षा गलत फैसला था। उम्मीद थी कि समिति इस पर उचित संज्ञान लेगी। लेकिन अंतिम वर्ष में पेपर बढ़ाना और राज्यों को स्वतंत्र अधिकार देने की सिफारिश करना गलत है। उन्होंने मांग की है कि एमबीबीएस करने के बाद किसी भी तरह की परीक्षा नहीं रखी जाए।