ग्लोबल वार्मिंग और असंतुलन का असर अब मौसम पर दिखने लगा है। साल दर साल तापमान बढ़ने से सर्दी और बरसात का मौसम सिकुड़ता जा रहा है।
बारिश कम हो रही हैं, इससे ऋतु चक्र प्रभावित होने के साथ ही ग्राउंड वाटर लेबल में गिर रहा है। बरसात और सर्दी का ऋतु चक्र गड़बड़ाने का असर अब आने वाले मौसम पर भी पड़ेगा।
मौसम वैज्ञानिक इसको लेकर अभी से परेशान हैं। वैज्ञानिकों की सलाह है कि किसान कम सिंचाई वाली फसलें को प्राथमिकता दें।
विशेषज्ञों के अनुसार प्रदूषण बढ़ने और प्राकृतिक असंतुलन का सबसे बड़ा असर ऋतुओं का सामान्य न होना है। गर्मी, सर्दी और बरसात का आगमन भी समयानुरूप नहीं है।
बदलते मौसम में बारिश के साथ ही इस बार सर्दी भी आ गई हैं। वर्ष 2015 में बारिश औसत से 40 फीसदी कम हुई थी। इसका असर सर्दी पर दिखाई दे रहा है। दिसंबर और मध्य जनवरी तक सर्दी शुरू नहीं हुईं।
जनवरी में 10 दिन भीषण सर्दी पड़ी और फिर एक साथ मौसम गर्म हो गया। मौसम वैज्ञानिक डा. विवेकराज सिंह ने बताया कि इस बार सर्दियों में होने वाली बारिश भी नहीं हुई। इसका असर गर्मी और बरसात पर पड़ेगा।
विशेषज्ञोंका अनुमान है कि इस बार भीषण गर्मी पड़ेगी और यह लंबे समय तक रहेगी। बरसात का मौसम कमजोर रहेगा। बारिश हल्की होगी और कम समय तक रहेगी।
इससे पेयजल और खेती प्रभावित होगी। इस संदर्भ में विशेषज्ञ टीम की बैठक मार्च में दिल्ली में होगी। कृषि उपनिदेशक प्रसार वीके शिशौदिया के अनुसार बारिश कम होने और गर्मी ज्यादा होने का असर फसलों पर पड़ेगा। इसके चलते किसानों से ऐसी फसलों की खेती करने का आग्रह किया जा रहा है, जिनको पानी की कम जरूरत पड़े।
वर्ष-भूजल स्तर
1990-60 फिट
2000-65 फिट
2005-75 फिट
2010-85 फिट
2012-95 फिट
2015-110 फिट