कोर्ट ने इस पर चुनाव आयोग के वकील अमित शर्मा से पूछा तो उन्होंने बताया उन्हें फैसले की कोई जानकारी नहीं है। कोर्ट ने कहा वह अगर फैसले की कॉपी मंगा सकते हैं तो मंगा लें। अमित शर्मा ने वापस आकर कोर्ट को बताया कि उन्होंने कोशिश की लेकिन कॉपी नहीं मिली है।
कोर्ट के समक्ष अधिवक्ता मनीष वशिष्ट ने कहा कि चुनाव आयोग का फैसला पूरी तरह से गलत व एक पक्षीय है क्योंकि यह फैसला उनका पक्ष जाने बिना दिया गया है। यह मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन था।
चुनाव आयोग को उन्हें सुनवाई की जानकारी देनी चाहिए थी। जस्टिस पल्ली ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि यह याचिका यहां विचाराधीन है इसलिए चुनाव आयोग सुनवाई नहीं कर सकता था। इस बात को भी नहीं माना जा सकता कि विधायकों को चल रही सुनवाई की जानकारी नहीं थीं।
चुनाव आयोग में शिकायत दायर होने के बाद नोटिस दिया गया था। विधायकों की ओर से अक्तूबर 2016, सितंबर 2017 व नवंबर 2017 में नोटिस का जवाब दिया गया था। इसके अलावा इन विधायकों ने यह भी कभी नहीं किया कि मामला हाईकोर्ट में है इसलिए आयोग सुनवाई न करें।
पेश मामला 21 विधायकों को अयोग्य ठहराये जाने से जुड़ा है। अधिवक्ता प्रशांत पटेल ने राष्ट्रपति को शिकायत देकर आरोप लगाया था कि सरकार ने अपने विधायकों को लाभ पहुंचाने के लिए संसदीय सचिव बनाया है।
उन्हें इस काम के लिए दिल्ली सरकार की ओर से वेतन व भत्ते दिए जा रहे हैं। राष्ट्रपति ने यह शिकायत चुनाव आयोग के पास सुनवाई के लिए भेजी थी। आप विधायकों ने सरकार व विधानसभा की ओर से वेतन व भत्ते दिए जाने का खंडन किया था।
इसके बाद सरकार ने इन नियुक्तियों को रद्द कर दिया था। चुनाव आयोग का शुक्रवार को फैसला आने के बाद आप के विधायक मदन लाल, राजेश गुप्ता, नितिन त्यागी, जरनैल सिंह समेत छह विधायकों ने याचिका दायर कर फैसले को स्थगित करने और उन्हें सुने जाने की मांग की है।