हाईकोर्ट ने कहा- प्रक्रियात्मक सुरक्षा को गंभीर अपराधों की वैध जांच को रोकने के ढाल नहीं बनाया जा सकता
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि यदि पहली गिरफ्तारी में पुलिस द्वारा प्रक्रियात्मक चूक हुई हो तो कानूनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बाद में दोबारा गिरफ्तारी पर कोई रोक नहीं है। यह फैसला न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने 15 जुलाई को चार कथित संगठित अपराध सिंडिकेट के आरोपी अनवर खान, हासिम बाबा, समीर, और जोया खान द्वारा उनकी दोबारा गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए सुनाया।
कोर्ट ने कहा कि आपराधिक कानून में प्रक्रियात्मक सुरक्षा नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आवश्यक है लेकिन इसे गंभीर अपराधों की वैध जांच को रोकने का ढाल नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पहली गिरफ्तारी में तकनीकी खामियों के कारण रिहाई होने के बावजूद यदि प्रक्रियात्मक अनियमितताओं को ठीक कर लिया जाए और गिरफ्तारी के आधार स्पष्ट रूप से प्रदान किए जाएं तो दोबारा गिरफ्तारी अवैध नहीं मानी जा सकती।
मामले में याचिकाकर्ताओं की पहली गिरफ्तारी को केवल तकनीकी आधारों पर अवैध घोषित किया गया था, क्योंकि लिखित गिरफ्तारी के आधार प्रदान नहीं किए गए थे। हालांकि, राज्य के अतिरिक्त स्थायी वकील संजीव भंडारी और विशेष लोक अभियोजक अखंड प्रताप सिंह ने तर्क दिया कि पहली रिहाई केवल तकनीकी चूक के कारण थी, न कि अपराध के सबूतों की कमी के कारण। उन्होंने कहा कि दोबारा गिरफ्तारी के दौरान नए आधार प्रदान किए गए और सभी प्रक्रियात्मक सुरक्षा का पालन किया गया। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि गंभीर अपराधों की जांच में तकनीकी खामियां न्याय को बाधित नहीं कर सकतीं। यह फैसला सुनिल जैन हत्या मामले से जुड़ा है जिसमें याचिकाकर्ताओं को 10 जून को दोबारा गिरफ्तार किया गया था। ब्यूरो