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दिल्ली में प्रवेश करते ही ट्रेनों की रफ्तार पड़ जाती है धीमी, झुग्गियां लगा देती हैं ब्रेक

Sat, 05 Sep 2020 04:26 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
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लाजपत नगर रेलवे लाइन के पास बनी झुग्गियां... - फोटो : अमर उजाला
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रेलवे बेशक बुलेट ट्रेन चलाने की योजना तैयार कर रहा है, लेकिन राजधानी दिल्ली में ही 20 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से ट्रेन चलाना लोको पायलटों के लिए भारी पड़ता है। ट्रैक के किनारे बसी झुग्गियां इसमें बाधा बनती हैं।

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कई बार झुग्गियां हटाने का प्रयास किया गया, लेकिन राजनीतिक दखल से अभियान ठंडे बस्ते में चला गया। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद रेलवे झुग्गियां हटाने की मुहिम में जुट गया है। हालांकि, बड़ी समस्या यह है कि ट्रैक के किनारे बसी 48 हजार झुग्गियों का पुनर्वास कहां किया जाए।

उत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी दीपक कुमार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का अध्ययन किया जा रहा है। जल्द ही जरूरी कदम उठाया जाएगा। रेलवे पुलिस भी इस काम में जुटेगी।
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जमीन की कीमत तीन हजार करोड़ से ज्यादा
रेलवे के अधिकारियों का कहना है कि 59.88 हेक्टेयर जमीन कब्जे में है। इस जमीन की कीमत तीन हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है। सभी झुग्गियों का अतिक्रमण सिग्नल के पास तक है। ऐसे में दिल्ली में प्रवेश करते ही मुख्य स्टेशन तक पहुंचने में हर ट्रेन को एक घंटे से अधिक लग जाता है। दिल्ली अर्बन शेल्टर बोर्ड के आधार पर रेलवे के अधिकारी बताते हैं कि 2015-16 के बीच सर्वे में 50 हजार के करीब झुग्गियों के आंकड़े जुटाए गए थे। इनमें साढ़े तीन लाख से अधिक लोग रहते हैं।

किस ट्रैक के किनारे कितनी झुग्गियां
तिलक ब्रिज-3 हजार, सुखदेव नगर-5 हजार, निजामुद्दीन-पलवन लाइन-4 हजार, जखीरा- 5 हजार चंद्रशेखर आजाद नगर-4 हजार, शकूरबस्ती लाइन-1.5 हजार, मायापुरी- 2 हजार, कबीर नगर-1500, पुराना सीलमपुर- 2 हजार, अजीत नगर व सीलमपुर-3 हजार, जीटी रोड शाहदरा-2 हजार, शाहदरा, रामनगर-डेढ़ हजार
 

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फास्ट ट्रैक मिलेगा, दिल्ली की सूरत भी बदलेगी

रेलवे किनारे से झुग्गियां हटा दी गईं तो न केवल रेलवे को फास्ट ट्रैक मिल जाएगा, बल्कि दिल्ली की सूरत भी बदलेगी। अगर पलवल की तरफ से दिल्ली में जैसे ही ट्रेन से आते हैं, तो कीर्ति नगर से ही ट्रैक के दोनों तरफ और फिर पूर्वी दिल्ली के शाहदरा व सीलमपुर तक झुग्गियां ही दिखाई पड़ती हैं। ट्रैक किनारे काफी गंदगी रहती है। लोग ट्रैक पर ही मल-मूत्र के साथ कचरा फेंकते हैं। इससे ट्रैक भी खराब होता है। विकास योजनाएं भी अतिक्रमण के कारण फाइलों में दबी हैं।

ट्रेनों पर फेंके जाते हैं पत्थर
झुग्गियों के कारण इस रूट पर सफर करना भी यात्रियों की सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी है। जब भी शताब्दी व राजधानी जैसी ट्रेनें गुजरती है तो पत्थर फेंके जाते हैं। वंदे भारत ट्रेन पर भी पत्थरबाजी की गई थी। कई बार झुग्गियों में रहने वाले स्मैकिये भी ट्रेन में चढ़ जाते हैं।

90 के दशक से बसने लगी थी झुग्गियां
रेलवे अधिकारियों का कहना है कि 90 के दशक से ही ट्रैक के किनारे झुग्गियां बसने लगी थी। उस दौरान जब भी प्रशासन अतिक्रमण को हटाने की मुहिम छेड़ता था, तो राजनीति शुरू हो जाती थी। पिछले दिनों ही शकूरबस्ती से जब झुग्गियां हटाने का प्रयास शुरू किया गया और बेघर लोगों में से किसी बच्चे की मौत हो गई, तो राजनीतिक भूचाल आ गया था।

सेफ्टी जोन में ही 27 हजार से ज्यादा झुग्गियां
रेलवे अधिकारियों का कहना है कि लगभग 27 हजार से ज्यादा झुग्गियां सेफ्टी जोन में बसी हैं। रेलवे के नियम के अनुसार, पटरियों के दोनों ओर 15 मीटर का क्षेत्र सेफ्टी जोन कहलाता है। ट्रेनों की सुरक्षित आवाजाही के लिए इस क्षेत्र में कोई भी निर्माण कार्य नहीं होना चाहिए।

ट्रैक के दोनों तरफ दीवार बनाने की योजना
अतिक्रमण को देखते हुए रेलवे ट्रैक के दोनों तरफ दीवार बनाने की योजना भी तैयार कर रहा है। अधिकारियों का कहना है कि राज्य सरकार को कई बार पैसे भी दिए गए, ताकि झुग्गियां हटाई जा सकें। 156 करोड़ रुपये देने की योजना थी। इस बजट को बढ़ाकर 200 करोड़ रुपये किया गया, लेकिन समाधान नहीं निकला। पुनर्वास के लिए 80 हजार रुपये देने के प्रावधान को बढ़ाकर 20 लाख प्रति झुग्गी कर दिया गया था।

रिंग रेल का नहीं हो पा रहा विकास
कभी दिल्ली की लाइफ लाइन रही रिंग रेल के स्टेशन और स्टेशन तक पहुंचने का रास्ता भी अतिक्रमण की चपेट में है। नया ट्रैक बिछाने में भी परेशानी है। ग्रेड सेपरेटर का काम शकूरबस्ती व दया बस्ती में रुका हुआ है। शकूरबस्ती में कोचिंग टर्मिनल अतिक्रमण की वजह से बाधित है। दया बस्ती के पास दोहरी लाइन ग्रेड सेपरेटर बनाए जाने की स्वीकृति मिलने के बाद भी योजना लटकी है।
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