अंकुर ने बताया कि देश में इस वक्त कितने मरीज इस खतरनाक बीमारी एस से ग्रस्त हैं। इनकी सटीक जानकारी सरकार के पास उपलब्ध नहीं है। न ही सरकार ने अभी तक इस बीमारी को गंभीर रोगों की सूची में शामिल किया है। जिसकी वजह से मरीज को सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं मिल पाता। प्राइवेट में इस बीमारी का उपचार लाखों रुपये में है। करीब 18 से 20 लाख रुपये का खर्चा आता है। इसलिए उपचार हर किसी के वश में भी नहीं है।
प्रधानमंत्री कार्यालय में अंडर सेक्रेटरी को भेजे अपने पत्र में अंकुर ने बताया कि वे कई वर्षों से इस बीमारी से ग्रस्त हैं। देश के सबसे बड़े चिकित्सीय संस्थान एम्स से लेकर दिल्ली के प्राइवेट अस्पतालों तक में वे चक्कर काट चुके हैं।
लेकिन हर जगह उन्हें इलाज में लाखों रुपये का खर्च बता दिया जाता है। सरकार से मदद के लिएवे कई बार पत्र भी लिख चुके हैं। लेकिन अब तक बीमारी का बोझ उन पर बना हुआ है। अंकुर का कहना है कि मरीज तो क्या चिकित्सकीय स्तर पर भी कई बार इस बीमारी का खुलासा करने में डॉक्टर चक्कर खा जाते हैं। मरीजों की संख्या लाखों में है, जबकि अस्पतालों में इनका इलाज करने वाले डॉक्टर कुछेक ही हैं।