मनोवैज्ञानिक विचारों पर पड़ता है गंभीर असर
इंडियन साइकिएट्रिक सोसाइटी के प्रेसिडेंट डॉक्टर मृगेश वैष्णव ने कहा कि इस तरह की बहस के दौरान अपनी बात ज्यादा प्रभावशाली ढंग से रखने की कोशिश में कई बार लोग ज्यादा ऊंची आवाज में बोलने लगते हैं और आवेशित हो जाते हैं। इसमें वे अपना संतुलन खो देते हैं। इसका उनके शरीर के साथ-साथ मनोविज्ञान पर भी गंभीर असर पड़ता है। अगर हम सच को स्वीकार करना सीख सकें तो तनाव को कम किया जा सकता है। राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण राजनेता सच जानकर भी उसे स्वीकार नहीं कर सकते, लिहाजा उनमें एक अन्तर्द्वन्द उत्पन्न होता है जो उनका तनाव का स्तर बढ़ाता है। उन्होंने कहा कि अगर राजनेता अपनी बात कहकर शेष जनता के हाथ में छोड़ने की कोशिश करें तो वे अस्वाभाविक तनाव से बच सकते हैं।
कांग्रेस नेता ने कहा बंद हो नफरत की राजनीति
टीवी डिबेट्स में कांग्रेस का हमेशा मजबूती से पक्ष रखने वाली रागिनी नायक ने कहा कि राजीव त्यागी की मौत के बाद उन्होंने उनके परिवार के लोगों से बातचीत की। उनके परिवार के लोगों ने बताया कि बहस के अंतिम क्षणों में ही वे कुछ परेशान होने लगे थे। बहस पूरी होने के कुछ ही मिनट बाद उन्हें खून की उल्टियां होनी शुरू हो गईं और बाद में उनकी मौत हो गई। उनके बेटे ने उन्हें बचाने के लिए काफी कोशिश की, लेकिन वे उन्हें बचा नहीं पाए।
रागिनी नायक ने कहा कि टीवी पर बहसों में भी धर्म-संप्रदाय की नफरत वाली राजनीति की जा रही है। कुछ एंकर भी एक विशेष विचारधारा को आगे बढ़ाने की कोशिश करते हुए बहस आयोजित करते हैं जिससे माहौल खराब हो जाता है। उन्होंने कहा कि आज मीडिया को अपनी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ होने की जिम्मेदारी निभाना चाहिए। समाज को भी नफरत भरे संदेश देने वाले मीडिया प्रोग्राम्स को बायकाट करना चाहिए।
समाज के ही लोग कर रहे बहस
टीवी पर अपनी तेज तर्रार बहस के लिए मशहूर भाजपा नेता प्रेम शुक्ला कहते हैं कि टीवी पर बहस हो या किसी गली-चौराहे पर होने वाली बहस, इनमें इसी समाज के लोग भाग लेते हैं और वही बात कहते हैं जो इस समाज के अंदर चल रही होती है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी तक सबको कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। जिसका जैसा स्तर होता है वह अपने उसी स्तर के हिसाब से उनकी आलोचना करता है। लेकिन एक अच्छे नेता को हर तरह की आलोचनाओं से बचते हुए, उनसे सकारात्मक संदेश लेते हुए आगे बढ़ने की सोच रखनी चाहिए।
प्रेम शुक्ला ने कहा कि ह्रदय रोग या उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियां किसी को भी परेशान कर सकती हैं। हर राजनीतिक दल को केवल शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ लोगों को ही बहस में भेजना चाहिए क्योंकि इनमें अक्सर कुछ तनावपूर्ण माहौल बन जाता है। उन्होंने कहा कि टीवी डिबेट में कोई नकारात्मक माहौल न बने, इसके लिए एंकर और मीडिया रूम को ज्यादा प्रभावशाली भूमिका निभानी चाहिए। केवल एक व्यक्ति को बोलने की इजाजत मिले, उस दौरान बाकी लोगों के ऑडियो म्यूट कर दिया जाए तो भी बहस के दौरान होने वाली अनावश्यक उत्तेजना को कम किया जा सकता है।