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चेतावनी! हार्ट अटैक-ब्लड प्रेशर रोगियों के लिए जानलेवा हो सकती है टीवी की गरमा-गरम बहस

Thu, 13 Aug 2020 09:04 PM IST
Vikas Kumar डिजिटल ब्यूरो, नई दिल्ली
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हार्ट अटैक (प्रतिकारात्मक) - फोटो : pixaby
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क्या टीवी पर किसी संवेदनशील मुद्दे पर उत्तेजनात्मक बहस करना या देखना जानलेवा साबित हो सकता है? अगर स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो हार्ट अटैक या हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों के लिए किसी उत्तेजनात्मक बहस में भाग लेना खतरनाक साबित हो सकता है। इसमें आपकी जान भी जा सकती है। विशेषज्ञों की सलाह है कि जिन लोगों को ऐसी गंभीर बीमारी है, उन्हें इस तरह की उत्तेजनात्मक बहस से बचना चाहिए। कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी की बुधवार को एक टीवी डिबेट के बाद हार्ट अटैक से मौत हो गई थी। कुछ लोगों का मानना है कि डिबेट से उपजी मानसिक समस्या उनके लिए जानलेवा सबित्त हुई।

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मैक्स अस्पताल, साकेत के हृदय रोग विभाग के निदेशक डॉक्टर केवल कृष्ण ने अमर उजाला को बताया कि सामान्य लोगों को इस तरह की बहस से कोई नुकसान नहीं पहुंचता है, लेकिन जिन लोगों को ह्रदय या उच्च रक्तचाप की गंभीर बीमारी है, उनके लिए किसी उत्तेजनात्मक बहस में भाग लेना खतरनाक साबित हो सकता है। सही समय पर इलाज न मिले तो इसमें उनकी जान भी जा सकती है, इसलिए ऐसे लोगों को इस तरह की बहस से बचना चाहिए।  

डॉक्टर केवल कृष्ण ने कहा कि इस तरह के मामलों में तनाव सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। तनाव बढ़ने से रक्तचाप का स्तर अचानक बढ़ने लगता है। इससे रक्त वाहिनी धमनियों और ह्रदय पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और मानसिक समस्या भी बढ़ने लगती है। जिन लोगों में एडवर्स क्वोशेंट (विपरीत परिस्थितियों को झेलने की क्षमता) कम विकसित हुई होती है, वे इन परिस्थितियों में टूट सकते हैं। इससे बचने के लिए सकारात्मक सोच और प्रेरणादायक कथनों से स्वयं को ऊर्जावान बनाए रखना चाहिए। ईश्वर की पूजा या योग करना भी तनावपूर्ण परिस्थितियों से जूझने में मदद करता है।

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मनोवैज्ञानिक विचारों पर पड़ता है गंभीर असर

इंडियन साइकिएट्रिक सोसाइटी के प्रेसिडेंट डॉक्टर मृगेश वैष्णव ने कहा कि इस तरह की बहस के दौरान अपनी बात ज्यादा प्रभावशाली ढंग से रखने की कोशिश में कई बार लोग ज्यादा ऊंची आवाज में बोलने लगते हैं और आवेशित हो जाते हैं। इसमें वे अपना संतुलन खो देते हैं। इसका उनके शरीर के साथ-साथ मनोविज्ञान पर भी गंभीर असर पड़ता है। अगर हम सच को स्वीकार करना सीख सकें तो तनाव को कम किया जा सकता है। राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण राजनेता सच जानकर भी उसे स्वीकार नहीं कर सकते, लिहाजा उनमें एक अन्तर्द्वन्द उत्पन्न होता है जो उनका तनाव का स्तर बढ़ाता है। उन्होंने कहा कि अगर राजनेता अपनी बात कहकर शेष जनता के हाथ में छोड़ने की कोशिश करें तो वे अस्वाभाविक तनाव से बच सकते हैं।

कांग्रेस नेता ने कहा बंद हो नफरत की राजनीति

टीवी डिबेट्स में कांग्रेस का हमेशा मजबूती से पक्ष रखने वाली रागिनी नायक ने कहा कि राजीव त्यागी की मौत के बाद उन्होंने उनके परिवार के लोगों से बातचीत की। उनके परिवार के लोगों ने बताया कि बहस के अंतिम क्षणों में ही वे कुछ परेशान होने लगे थे। बहस पूरी होने के कुछ ही मिनट बाद उन्हें खून की उल्टियां होनी शुरू हो गईं और बाद में उनकी मौत हो गई। उनके बेटे ने उन्हें बचाने के लिए काफी कोशिश की, लेकिन वे उन्हें बचा नहीं पाए।

रागिनी नायक ने कहा कि टीवी पर बहसों में भी धर्म-संप्रदाय की नफरत वाली राजनीति की जा रही है। कुछ एंकर भी एक विशेष विचारधारा को आगे बढ़ाने की कोशिश करते हुए बहस आयोजित करते हैं जिससे माहौल खराब हो जाता है। उन्होंने कहा कि आज मीडिया को अपनी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ होने की जिम्मेदारी निभाना चाहिए। समाज को भी नफरत भरे संदेश देने वाले मीडिया प्रोग्राम्स को बायकाट करना चाहिए।
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समाज के ही लोग कर रहे बहस

टीवी पर अपनी तेज तर्रार बहस के लिए मशहूर भाजपा नेता प्रेम शुक्ला कहते हैं कि टीवी पर बहस हो या किसी गली-चौराहे पर होने वाली बहस, इनमें इसी समाज के लोग भाग लेते हैं और वही बात कहते हैं जो इस समाज के अंदर चल रही होती है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी तक सबको कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। जिसका जैसा स्तर होता है वह अपने उसी स्तर के हिसाब से उनकी आलोचना करता है। लेकिन एक अच्छे नेता को हर तरह की आलोचनाओं से बचते हुए, उनसे सकारात्मक संदेश लेते हुए आगे बढ़ने की सोच रखनी चाहिए।

प्रेम शुक्ला ने कहा कि ह्रदय रोग या उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियां किसी को भी परेशान कर सकती हैं। हर राजनीतिक दल को केवल शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ लोगों को ही बहस में भेजना चाहिए क्योंकि इनमें अक्सर कुछ तनावपूर्ण माहौल बन जाता है। उन्होंने कहा कि टीवी डिबेट में कोई नकारात्मक माहौल न बने, इसके लिए एंकर और मीडिया रूम को ज्यादा प्रभावशाली भूमिका निभानी चाहिए। केवल एक व्यक्ति को बोलने की इजाजत मिले, उस दौरान बाकी लोगों के ऑडियो म्यूट कर दिया जाए तो भी बहस के दौरान होने वाली अनावश्यक उत्तेजना को कम किया जा सकता है।
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