राजधानी वासियों को प्राप्त चिकित्सीय सुविधाओं को लेकर भले ही केंद्र और राज्य सरकार लंबे-चौड़े दावे करती हों, लेकिन हकीकत यह है कि एक एमआरआई जांच तक के लिए मरीज महीनों धक्के खा रहे हैं।
राजधानी के दो बड़े अस्पताल जीबी पंत और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में जब अमर उजाला के रिपोर्टर ने पड़ताल की तो मरीजों को प्रारंभिक स्तर पर मिलने वाली सुविधा तक प्रभावित मिली। आपातकालीन और इनडोर मरीजों को छोड़ रुटीन मरीजों को जीबी पंत अस्पताल में एमआरआई के लिए सात महीने से ज्यादा लंबी तारीख दी जा रही है।
वहीं एम्स में अगर कोई मरीज एमआरआई कराने पहुंचता है तो उसे अप्रैल 2021 से पहले का समय नहीं दिया जा रहा है। ऐसे में मरीजों के सामने निजी जांच केंद्रों पर जाने के अलावा अन्य कोई विकल्प भी नहीं बचा। बहरहाल दोनों ही अस्पताल प्रबंधन ने एमआरआई की इस परेशानी पर कोई जवाब नहीं दिया।
बिहार के आरा से एम्स पहुंचे विनोद कुमार कहते हैं कि इस स्थिति में गरीब मरीजों के लिए कोई विकल्प ही नहीं है। गंभीर बात ये है कि इस अव्यवस्था से मरीज ही नहीं, बल्कि दोनों ही अस्पतालों के डॉक्टर भी परेशान हैं। एम्स के ही एक वरिष्ठ डॉक्टर का कहना है कि एमआरआई की तारीख देना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है, लेकिन वेटिंग ज्यादा होने के कारण वे जरूरतमंद मरीजों की मदद नहीं कर पाते। जांच के बगैर मरीज का उपचार आगे बढ़ाना संभव ही नहीं है।
मरीजों की कहानी, उन्हीं की जुबानी
डीयू के बीकॉम तृतीय वर्ष के छात्र अभिनव मिश्रा बताते हैं कि उनकी मां के सिर में ट्यूमर है। बुलंदशहर के एक अस्पताल में दिखाने के बाद डॉक्टर ने जीबी पंत अस्पताल में रैफर कर दिया। पिछले तीन महीने में शुक्रवार को वे तीसरी बार अपनी मां को लेकर आए। अब डॉक्टर ने एमआरआई कराने के लिए कहा है लेकिन यहां अगस्त से पहले का समय नहीं दिया जा रहा।
डॉक्टर एमआरआई के बाद ही ऑपरेशन की तारीख देंगे। वहीं जीबी पंत अस्पताल में ही अपनी चाची को लेकर पहुंचे संजय सिंह ने बताया कि वे गॉल ब्लाडर में पथरी की परेशान हैं। पहले भी तीन बार उन्हें ओपीडी में दिखा चुके हैं। अब ऑपरेशन से पहले उन्हें एक पर्ची दी है जिस पर 10 हजार रुपये का सामान बाहर से लाने के लिए कहा है।
ठीक इसी तरह की परेशानी यूपी से एमआरआई के लिए एम्स आए आयुष्मान भारत के लाभार्थी राम किशोर गुप्ता ने बतायी। आयुष्मान भारत का कार्ड होने के बाद भी उपचार नहीं मिल पा रहा। इन्हें एम्स में अप्रैल 2021 में वापस आकर एमआरआई कराने के लिए कहा गया। रीढ़ की हड्डी में परेशानी है और ऑपरेशन के लिए अगले साल आने को कहा है।
सालों से नहीं थी मशीन, अब ओवरलोड
जीबी पंत अस्पताल में कई वर्षों से एमआरआई मशीन न होने के कारण जांच की सुविधा नहीं थी। लोकनायक अस्पताल की मशीन के सहारे ही जीबी पंत अस्पताल का काम चल रहा था। अस्पताल के सूत्रों के अनुसार दिल्ली सरकार के सबसे बड़े सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की इस दुर्दशा की शिकायतें कई बार सरकार तक पहुंची। करीब तीन साल बाद 16 करोड़ रुपये की लागत से जीबी पंत अस्पताल को 3-टेस्ला तकनीक युक्त मशीन मिली लेकिन अब ये मरीजों से ओवर लोड हो चुकी है।