दिल्ली-एनसीआर में बढ़ता प्रदूषण लोगों की सेहत पर भारी पड़ रहा है। सबसे ज्यादा खराब स्थिति हाईवे के किनारे की कालोनियों की है।
एनएच-24, एनएच-91 और एनएच-58 किनारे बसी कालोनियों में तो हवा में एसपीएम की मात्रा इतनी ज्यादा है कि सांस लेना जोखिम भरा है।
इन क्षेत्रों में प्रदूषण सांस रोग, फेफड़ों का कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां बांट रहा है। बच्चों और नवजात शिशु का वजन सामान्य से कम हो रहा है।
गाजियाबाद सूबे का सबसे प्रदूषित शहर है। सबसे ज्यादा परेशानी हाईवे किनारे की कालोनियों की है। यहां हवा में घुले एसपीएम (सॉलिड पार्टिकल मैटेरियल) फेफड़ों और सांस नली को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
हवा में एसपीएम का मानक 50 यूनिट प्रति घन मीटर के सापेक्ष 350 यूनिट प्रति घन मीटर तक है। जहरीली गैस के साथ मिलकर ये ठोस पार्टिकल फेफड़ों व सांस नली के कैंसर का कारण बनते हैं।
पॉल्यूशन विभाग के अनुसार हवा में एसपीएम के साथ ही एसओ-2 और सीओ-2 की मात्रा भी बढ़ रही है। दिल्ली-एनसीआर में पिछले तीन साल से कैंसर रोगियों की संख्या में 13 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।