जयपुर, गुरुग्राम व दिल्ली के तीनों ही किडनी रैकेट के तार आपस में जुड़े हुए हैं। तीनों ही गिरोह में किडनी डोनर व किडनी प्राप्तकर्ता बांग्लादेश के थे। इसके अलावा गुरुग्राम किडनी रैकेट का जब खुलासा हुआ तो गिरोह का मुख्य सदस्य भागकर दिल्ली आ गया था और दिल्ली किडनी रैकेट के सरगना रसेल के साथ छिपकर रह रहा था। दूसरी तरफ दिल्ली किडनी रैकेट की तरह जयपुर व गुरुग्राम किडनी रैकेट के कागजातों का क्लीयरेंस भी बांग्लादेश उच्चायोग में आरोपी कर्मचारी रूहुल अमीन ही करता था।
सहायक की गिरफ्तारी के पास चेन्नई फरार हो गई थी डाॅ. विजया
दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने जब 16 जून को इस गिरोह का पर्दाफाश किया तो उसके सातवें दिन यानी 23 जून को डाॅ. डी विजया कुमारी के सहायक विक्रम को गिरफ्तार किया था। तब तक पुलिस को डाॅ. विजया कुमारी के कनेक्शन की जानकारी नहीं थी। कार्रवाई के बाद डा. कुमारी चेन्नई फरार हो गई थी। इसके बाद जांच में उनकी पूरी भूमिका सामने आ गई थी।
दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि इसके बाद दिल्ली पुलिस ने अपोलो प्रशासन पर डाॅ. विजया को चेन्नई से वापस बुलाने का दबाव बनाया। अपोलो प्रशासन के कहने पर डाॅ. कुमारी दिल्ली वापस आ गई। इसके बाद अपराध शाखा में तैनात इंस्पेक्टर कमल कुमार की टीम ने एक जुलाई को उसे गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में आरोपी ने हिसाब-किताब से लेकर अन्य सभी मामलों का खुलासा कर दिया।
इसलिए जसौला विहार में ठहराते थे
अपोलो अस्पताल में बांग्लादेशियों के ऑपरेशन नहीं होते
बांग्लादेशियों के खिलाफ कुछ साल पहले मामला दर्ज हुआ था। उस समय भी किडनी प्रत्यारोपण का मामला दर्ज हुआ था। इसके बाद अपोलो अस्पताल में बांग्लादेशियों का ऑपरेशन नहीं होता है। हालांकि बांग्लादेशियों की बाकी जांच वगैरह हो जाती है।
ऐसे हुई गिरफ्तारी
करीब एक महीने चला था पूरा ऑपरेशन
दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा को भारत-बांग्लादेश किडनी प्रत्यारोपण गिरोह का पर्दाफाश करने में पूरा एक महीना लगा था। पुलिस को नौ जून को इस गिरोह के बारे में सूचना मिली थी। इसके बाद इंस्पेक्टर कमल कुमार की टीम ने आरोपियों के मोबाइल को सर्विलांस पर लिया। इंस्पेक्टर कमल कुमार की टीम ने 16 व 17 जून की रात दबिश देकर सभी आरोपियों को पकड़ लिया। 23 जून को डाॅ. डी विजया कुमारी के सहायक विक्रम को गिरफ्तार किया गया। डा़ॅक्टर को चेन्नई से वापस आने के बाद एक जुलाई को गिरफ्तार किया था।