पार्षद से सांसद तक पहुंचे, जनता पार्टी की लहर में सबसे ज्यादा मतों से जीते थे
तीन बार लोकसभा पहुंचे, लेकिन दंगा आरोपों ने खत्म कर दिया राजनीतिक सफर
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
दिल्ली की राजनीति में सज्जन कुमार का नाम एक ऐसे नेता के तौर पर दर्ज है, जिसने बेहद साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर सत्ता के गलियारों तक अपनी जगह बनाई। युवावस्था में जुझारू तेवर, संजय गांधी से नजदीकी, सड़क पर लगातार सक्रिय रहने की शैली और संगठन में मजबूत पकड़ ने उन्हें दिल्ली कांग्रेस के बड़े नेताओं की कतार में पहुंचाया। नगर निगम के पार्षद से लोकसभा सांसद तक का सफर तय करने वाले सज्जन कुमार की सियासी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ हालांकि 1984 के सिख विरोधी दंगे बने। दंगों से जुड़े आरोपों और वर्षों चली न्यायिक प्रक्रिया ने आखिरकार उनके राजनीतिक करियर को पूरी तरह खत्म कर दिया।
दरियागंज के जटवाड़ा कला गांव में पले-बढ़े सज्जन कुमार की इमरजेंसी से पहले संजय गांधी से करोल बाग इलाके में मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात ने उनको राजनीति में प्रवेश देने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि वह उस समय दिल्ली के कई कांग्रेसी नेताओं के संपर्क में थे। संजय गांधी से संबंध आगे चलकर सज्जन कुमार के राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी ताकत बना। इमरजेंसी खत्म होने के बाद 1977 में दिल्ली नगर निगम के चुनाव हुए। देश में जनता पार्टी की जबरदस्त लहर थी और कांग्रेस के लिए चुनाव बेहद मुश्किल माना जा रहा था। इसके बावजूद संजय गांधी के भरोसे पर कांग्रेस ने सज्जन कुमार को नांगलोई वार्ड से टिकट दिया। इस चुनाव में उन्होंने सबसे अधिक मतों से जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक ताकत का परिचय दिया। इसके बाद वह दिल्ली कांग्रेस में तेजी से उभरते गए। जनता पार्टी सरकार के दौरान इंदिरा गांधी और संजय गांधी की विभिन्न मामलों में मुकदमों की सुनवाई के दौरान सज्जन कुमार अपने समर्थकों के साथ अदालतों के बाहर सक्रिय रहते थे। उनकी यह आक्रामक राजनीतिक शैली उनकी पहचान बन गई।
1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सज्जन कुमार को बाहरी दिल्ली से उम्मीदवार बनाया। मुकाबला दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री और कभी कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे चौधरी ब्रह्म प्रकाश से था। उस समय ब्रह्म प्रकाश चौधरी चरण सिंह की सरकार में केंद्रीय मंत्री थे और लोकदल के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में थे। सज्जन कुमार ने उन्हें पराजित कर पहली बार लोकसभा में प्रवेश किया।
1984 के बाद पहली बार राजनीतिक संकट
1984 ने उनकी राजनीति की दिशा बदल दी। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में हुए सिख विरोधी दंगों में सज्जन कुमार का नाम सामने आया। उन पर लगे आरोपों ने कांग्रेस के लिए भी राजनीतिक असहजता पैदा की। वर्ष 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उनका टिकट काट दिया और 1989 में भी उन्हें टिकट नहीं मिला। इसके बावजूद उनका राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। वर्ष 1991 में कांग्रेस ने एक बार फिर उन्हें बाहरी दिल्ली से मैदान में उतारा और उन्होंने चुनाव जीतकर संसद में वापसी की और 1996 में भी उन्हें टिकट मिला, लेकिन इस बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
वर्ष 2004 में फिर संसद पहुंचे, 2009 में दंगों ने फिर रोका रास्ता
कांग्रेस ने वर्ष 1998 व 1999 में दंगों के कारण उनका टिकट काट दिया, मगर 2004 में एक बार फिर सज्जन कुमार पर भरोसा किया। बाहरी दिल्ली से चुनाव लड़कर उन्होंने भाजपा के दिग्गज नेता और केंद्रीय मंत्री रहे साहिब सिंह वर्मा को पराजित किया और लोकसभा में लौटे। लेकिन 2009 में 1984 के दंगों का मुद्दा फिर निर्णायक बन गया। सिख संगठनों के विरोध के बीच कांग्रेस को उनका टिकट वापस लेना पड़ा। उनकी जगह उनके भाई रमेश कुमार को दक्षिण दिल्ली से उम्मीदवार बनाया गया। इसके बाद सज्जन कुमार का सक्रिय चुनावी राजनीति में वापसी का रास्ता लगभग बंद हो गया।