सीआरपीएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस के अधिकारी बताते हैं कि आतंकवादी, जम्मू-कश्मीर के बेरोजगार युवकों को आसानी से अपने जाल में फंसा लेते हैं।हालत ऐसी है कि पैसे के चक्कर में ये युवक, जिनमें नाबालिग भी शामिल हैं, आतंकवादियों के साथ मिल जाते हैं।
चूंकि अब कई वर्षों से भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा आतंकियों का पड़े पैमाने पर सफाया किया जा रहा है, इसलिए आतंकी संगठनों के पाकिस्तान में बैठे सरगनाओं ने अब अपनी रणनीति में बदलाव किया है।
वे जम्मू-कश्मीर में अपने स्लीपर सेल की मदद से अस्सी के दशक वाली रणनीति दोबारा से अमल में ला रहे हैं। उस वक्त भी बड़ी संख्या में आतंकवादी मारे जा रहे थे, सीधा हमला या क्रॉस फायरिंग में आतंकियों को भारी नुकसान पहुंच रहा था।
इसका तोड़ उन्होंने हैंड ग्रेनेड के रूप में निकाला। जम्मू-कश्मीर में मौजूद आतंकियों के स्लीपर सेल, यानी ठेकेदार स्थानीय युवाओं को बरगला कर उन्हें अपने समूह का हिस्सा बनाने लगे। चूंकि हैंड ग्रेनेड फेंकने के लिए किसी बड़ी ट्रेनिंग की जरूरत नहीं होती, इसलिए दो-तीन दिन में युवाओं को बारिकियां समझा दी जाती हैं।
टारगेट पर ज्यादा से ज्यादा नुकसान कैसे किया जाए, यही सब सिखाया जाता है। जोर केवल एक बात पर रहता है कि हैंड ग्रेनेड जहां भी फेंकना हो, उसे बीच में ही फेंके।
सीआरपीएफ के पूर्व आईजी वीपीएस पंवार, जिन्होंने कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राज्यों में कई बड़े ऑपरेशनों को अंजाम दिया है, बताते हैं कि अस्सी के दशक में आतंकवादी संगठन ठेकेदार को हैंड ग्रेनेड और ढाई सौ रुपये देते थे।
ठेकेदार आगे जिससे ग्रेनेड फिकवाता था, उसे 50 रुपये मिलते थे। अब वह राशि पांच सौ रुपये या एक हजार रुपये हो गई है। चूंकि वहां बेरोजगारी इतनी है कि पांच सौ रुपये से कम की राशि में भी कोई युवक हैंड ग्रेनेड फेंकने के लिए तैयार हो जाता है।
पहली बात, हैंड ग्रेनेड के हमले में सबूत जुटाना जांच एजेंसियों के लिए बहुत मुश्किल होता है। अगर कहीं भीड में से किसी ने हैंड ग्रेनेड फेंक दिया तो उसका पता ही नहीं लग पाता।
आतंकियों के साथ आमने-सामने की लड़ाई में तो हथियार, गोला बारुद, फोन, डायरी, कोड नंबर या अन्य कोई सबूत मिल जाता है, लेकिन हैंड ग्रेनेड न तो किसी को दिखता है और न ही फेंकने के बाद उसका कोई साक्ष्य मिलता है। कश्मीर में सुरक्षा बलों पर जो पत्थराव होता है, वह भी ठेकेदारों के जरिए कराया जाता है।
जम्मू-कश्मीर में आतंकी संगठन जिन हैंड ग्रेनेड का इस्तेमाल कर रहे हैं, वे भारतीय ग्रेनेड के वज़न के मुकाबले आधे होते हैं। जैसे हमारे यहां सुरक्षा बलों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले हैंड ग्रेनेड का वजन पांच सौ से सात सौ ग्राम रहता है, जबकि आतंकियों के ग्रेनेड ढाई सौ ग्राम के होते हैं।
अगर यह ग्रेनेड लोगों के समूह के बीच में पड़ता है तो दर्जनभर व्यक्ति मारे जा सकते हैं। जांच एजेंसियों ने इस बात के पुख्ता सबूत जुटा लिए हैं कि ये हल्के हैंड ग्रेनेड चीन में बनते हैं और वहां से पाकिस्तान होते हुए भारत आते हैं। इन्हें लंच बॉक्स या वाटर बोतल में आसानी से रखा जा सकता है।
ऐसे में किसी को शक भी नहीं होगा। आतंकियों के स्लीपर सेल अब नाबालिगों पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं। अगर कोई युवा हैंड ग्रेनेड फेंकने के अलावा हथियार भी उठाना चाहता है तो उसे पांच हजार से सात हजार रुपये तक दिए जाते हैं। प्रशिक्षण भी मिलता है।
इस साल 18 जनवरी को कश्मीर घाटी में 48 घंटे के भीतर तीन जगहों पर हैंड ग्रेनेड फेंके गए थे। इसके बाद 21 मार्च को सोपोर में दो हैंड ग्रेनेड फेंकने की घटना और छह मई को एक पोलिंग स्टेशन पर हैंड ग्रेनेड से हमला किया गया।
सुरक्षा बलों ने एक लंच बॉक्स में हैंड ग्रेनेड बरामद किया था। सात मार्च को जम्मू बस स्टैंड पर भी हैंड ग्रेनेड से हमला हुआ। सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान से आ रही आतंकियों और गोला-बारुद की सप्लाई चेन अभी बंद नहीं हुई है। हालांकि काफी हद तक उस पर रोक लगी है। आतंकवादी संगठन अब सीमा पार की बजाए कश्मीर के युवाओं को ही आतंकी गतिविधियों में लगा रहे हैं।