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शिक्षक दिवस: यह दिन हर किसी के लिए क्यों है खास, आप भी शेयर करें अपने अनुभव

Tue, 04 Sep 2018 05:28 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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गुरु या फिर कहें शिक्षक हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। जीवन पथ पर आपका कोई भी शिक्षक हो सकता है, माता—पिता, भाई, दोस्त  या कोई और...। हम कितने भी बड़े ओहदे पर पहुंच जाएं, हमें हमारे शिक्षकों द्वारा सिखाया गया सबक हमेशा याद रहता है। शिक्षक दिवस के मौके पर आप हमें अपने पहले शिक्षक, जिसने आपको लिखना—पढ़ना या फिर कहें इस जगत का बोध कराया हो, मनुर्भव शब्द के मायने बताए हों, उससे जुड़ा अविस्मरणीय संस्मरण जिसे आप आजीवन नहीं भुला सकते, अमर उजाला से जरुर साझा करें। पेश है यह कहानी...

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आदिल की स्टोरी

आदिल पांचवीं कक्षा में था, जब पहली बार उसके पिता रईस ने उसे फुटबॉल लाकर दी। आदिल को फुटबॉल खेलने में खूब मजा आने लगा। धीरे-धीरे स्टेट टीम के कोच ने आदिल को स्पोर्ट्स अकादमी में शामिल कर लिया। रईस खासतौर पर ध्यान रखता था कि उसका बेटा फुटबॉल की कोई भी प्रैक्टिस न छोड़े।

आदिल को तैयारी करते हुए लगभग पांच साल बीत गए। लेकिन उसे कभी टीम में खेलने का मौका नहीं मिल पाया। कमजोर खिलाड़ी होने की वजह से वह टीम के अंतिम खिलाड़ियों में ही रह जाता था। हर बार वापस लौटकर रईस के पूछने पर आदिल चुप्पी साध जाता था। लेकिन रईस समझ जाता था। 

अपने बेटे का मनोबल बनाए रखने के लिए वह हमेशा आदिल को समझाता था, 'मुझे यकीन है कि जिस दिन तुम खेलोगे, पूरा स्टेडियम तुम्हारा फैन हो जाएगा।'  दुर्भाग्य से एक दिन घर लौटते वक्त रईस की एक रोड एक्सिडेंट में मृत्यु हो गई। 
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पिता ने दी सीख

कोच ने आदिल को एक हफ्ते की छुट्टी दे दी। लेकिन आदिल दूसरे ही दिन वापस स्टेडियम पहुंच गया। उस दिन दूसरे स्टेट की टीम से आदिल की टीम का दोस्ताना मैच था और आदिल की टीम हार रही थी। 

आदिल ने कोच से खेलने के लिए दरख्वास्त की। कोच जानता था कि उस दिन टीम हार जाएगी। दूसरी टीम पहले ही दो गोल से आगे थी। न जाने क्या सोचकर कोच ने आदिल को मैदान में खेलने के लिए भेज दिया। 

सभी खिलाड़ी आदिल को देख भौंचक्के रह गए, क्योंकि दो दिन पहले ही उसके पिता की मृत्यु हुई थी और अब वह खेल रहा था। देखते ही देखते मैच पलटने लगा। सबसे हैरानी की बात यह थी कि आदिल को मैदान में कोई रोक नहीं पा रहा था। 

कुछ ही देर में बिगुल बज गया और आदिल की टीम 3-2 से जीत गई। पूरे स्टेडियम में खुशी की लहर दौड़ उठी और आदिल को सबने कंधों पर उठा लिया। इस कहानी का यह तात्पर्य था कि जीवन में आपको जो आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें, वही आपका गुरु है।
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