स्वराज इंडिया ने सूचना अधिकार कानून में संशोधन को मूल भावना के खिलाफ बताया है। संगठन ने राष्ट्रपति से बिल को स्वीकृति नहीं देने की अपील भी की है।
संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने कहा कि 2005 में बने सूचना अधिकार कानून ने हर नागरिक को स्थानीय प्रशासन से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक से सवाल करने और तय समय सीमा में जवाब लेने का संवैधानिक अधिकार दिया।
आम नागरिकों द्वारा मांगी जाने वाली ज्यादातर सूचनाएं सरकार और सरकारी कामकाज से संबंधित होती हैं। इसलिए यह जरूरी है कि सूचना आयुक्तों को सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाए। कानून बनते समय सीआईसी पद को सरकार से स्वतंत्र रखा था। उच्चतम न्यायालय ने भी माना है कि पद को सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त रखना जरूरी है।
पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनुपम ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने हर संस्थान की स्वायत्तता खत्म कर दी है। लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही व्यक्ति विशेष के प्रति रह गई है। आरटीआई के नाम पर कभी लोन डिफॉल्टर्स की लिस्ट मांगी जाती थी तो कभी प्रधानमंत्री की हवाई यात्रा का ब्यौरा। अब इस सब पर पाबंदी लगाने की कोशिश की जा रही है।
सूचना का अधिकार कानून में संशोधन करके सूचना आयुक्तों का कार्यकाल, वेतन और सेवा शर्तें तय करने का काम केंद्र सरकार को दे दिया गया है। यानी अब तक सरकार से स्वतंत्र होकर काम करने वाले सीआईसी केंद्र सरकार की मर्जी के मोहताज होंगे।