सूरजकुंड मेले में महाराष्ट्र की ग्रामीण जीवनशैली के दर्शन आपको ‘अपना घर’ में होंगे। आधुनिकता की दौड़ में शहरों से अपना वजूद गवां चुके लकड़ी के यह दो मंजिला मकान आज भी पश्चिमी महाराष्ट्र के शोलापुर, कोल्हापुर, सतारा और सांगली आदि जिलों के ग्रामीण इलाकों में क्षेत्रीय संस्कृति की पहचान कराने के लिए जिंदा हैं। मराठी भाषा में इन्हें ‘धाबा का घर’ बोला जाता है।
महाराष्ट्र के अपना घर के तहत प्रदर्शित इस धाबा के घर में स्थानीय खान, पान, रहन सहन और संस्कृति के दर्शन हो रहे हैं। घर के मुखिया चिंतामणि महाराज (पंढरपुर) ने धाबा का घर के बारे में बताया कि यह घर दो मंजिला होते हैं और पूर्णतया लकड़ी से बनाए जाते हैं।
सूरजकुंड मेले में बनाया गया धाबा का घर पुणे के शनिवार वाड़ा स्थित लकड़ी से निर्मित नगारखाना की प्रतिकृति है। पचास साल पहले यह धाबा का घर महाराष्ट्र के शहरों में भी दिखते थे। आधुनिकता और शहरीकरण में अब यह घर ग्रामीण इलाकों में ही बचे हैं। इन घरों में अभी भी मिट्टी के चूल्हों पर खाना बनता है और पानी गर्म करने से लेकर खाना पकाने के बर्तन भी पीतल और लोहे के होते हैं।
भगवान विट्ठल का होता है भजन-पूजन
चिंतामणि महाराज ने बताया कि प्रत्येक घर में सुबह शाम भगवान विट्ठल का भजन पूजन होता है। खास मौकों पर भगवान विट्ठल की डोली और शोभायात्रा निकाली जाती है जिसमें पूरे गांव के लोग भजन और नृत्य के जरिए भगवान को प्रसन्न करते हैं। महाराष्ट्र की ग्रामीण संस्कृति के दर्शन कराने के लिए एक परिवार के 14 सदस्य यहां रह रहे हैं।
‘बंब’ है परंपरागत वाटर हीटर
चिंतामणि महाराज ने ‘धाबा का घर’ में रखे पानी गर्म करने वाला महाराष्ट्र का परंपरागत उपकरण बंब दिखाया। पीतल के बंब में पानी भरने के बाद बीच में स्थित पाइप में आग लगा दी जाती है और यहीं से लकड़ियां डाली जाती हैं। जलती हुई लकड़ियां बंब के नीचे स्थित एक जाली में इकट्ठा होती हैं जिनके गर्मी से बंब के अंदर का पानी गर्म होता है। यह गर्म पानी पीतल की गंगाड़ी में निकाला जाता है। चिंतामणि महाराज ने बताया कि पानी गर्म करने के लिए बंब का इस्तेमाल छत्रपति शिवाजी और उनके वंशजों ने भी किया था।