सुप्रीम कोर्ट ने मानेसर जमीन घोटाले में हरियाणा सरकार के फैसले को पलट दिया। हरियाणा की कांग्रेस सरकार ने 24 अगस्त 2007 में मानेसर में 600 एकड़ जमीन के अधिग्रहण की कार्रवाई को रोक दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सभी लेनदेन की जांच करने के लिए कहा है।
इनमें जमीन सौदे से बिचौलियों को हुई अवैध कमाई भी शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सरकारी मशीनरी और निजी बिल्डरों ने गठजोड़ कर भोले भाले किसानों की जमीन हड़पी और जनता के हितों से खिलवाड़ किया।
कोर्ट ने बिल्डरों को सरकार द्वारा कालोनी बनाने के लाइसेंस को अवैध माना। यह लाइसेंस अब हुडा और एचएसआईडीसी को ट्रांसफर कर दिए गए हैं। सीबीआई ने 15 मई 2017 को राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से मानेसर भूमि अधिग्रहण मामले में अनियमितताओं के बारे में पूछताछ की थी।
दरअसल यह मामला किसानों से 100 करोड़ रुपये की जमीन खरीदने से जुड़ा हुआ है जबकि इसकी असर कीमत बाजार दरों के अनुसार 1500 करोड़ रुपये थी। सीबीआई के अनुसार यह जमीन अगस्त 2004 से अगस्त 2007 के बीच खरीदी गई थी
25 लाख में खरीदी और 4.5 करोड़ में बेची
इसके लिए राज्य सरकार ने धमकी दी और किसानों को भूमि अधिग्रहण की झूठी जानकारी भी दी थी। शुरुआत में राज्य सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून के कई प्रावधानों के तहत अधिसूचना जारी की। सरकार ने कहा कि 912 एकड़ जमीन पर इंडस्ट्रियल माडल टाउनशिप (आईएमटी) बनेगी।
नतीजा यह हुआ कि बड़ी संख्या में किसानों ने सरकारी खरीद के डर से औने पौने में अपनी जमीन बेच दी। यह भी आरोप है कि लगभग 400 एकड़ जमीन किसानों ने निजी बिल्डरों ने अधिग्रहण का डर दिखाकर मामूली दरों पर खरीद ली।
मानेसर में 688 एकड़ बेशकीमती जमीन कौड़ियों के भाव निजी बिल्डरों को दिलाने के लिए भूमि अधिग्रहण कानून का सहारा लिया। सरकार ने धारा चार के तहत अधिसूचना जारी की। इसके जारी होती ही निजी बिल्डर किसानों के पास पहुंचे और उनसे कहा कि सरकार आपकी जमीन लेगी इससे अच्छा हमें दे दो।
सरकारी रेट तो कम ही होगा। किसानों 20 से 25 लाख रुपये एकड़ की मामूली रकम में जमीन इन बिल्डरों को बेच दी। जबकि जिन किसानों ने अधिसूचना की अंतिम तिथि आने का इंतजार किया उन्हें 80 लाख रुपये प्रति एकड़ तक का रेट मिला यहां तक कि यह जमीन 4.5 करोड़ प्रति एकड़ में भी बेची गई।
मुआवजे की अधिसूचना खत्म होने से दो दिन पहले 24 अगस्त 2007 को सरकार ने भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही को रोक दिया। इसके बाद जिन निजी बिल्डरों ने किसानों से सस्ते दाम में जमीन खरीदी थी वे सरकार के पास गए और हाउसिंग कालोनी बनाने का लाइसेंस मांगा, उन्हें यह लाइसेंस तत्काल दे दिए गए।
तब शुरू हुआ आंदोलन
जब किसानों को पता चला कि उनके साथ धोखा हुआ है तो वे आंदोलन पर उतर आए। उन्होंने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका यह कहकर खारिज कर दी कि प्राइवेट बिल्डर का मामला जन कानून में नहीं आता। इस पर किसान सुप्रीम कोर्ट चले गए। इस बीच धोखेबाजी और भ्रष्टाचार की एफआईआर भई दर्ज हो गई। बाद में जांच सीबीआई को सौंप दी गई।
क्या कहा अदालत ने
निजी बिल्डरों को पहले से ही पता था कि सरकार जमीन का अधिग्रहण नहीं करेगी। सरकारी मशीनरी और बिल्डरों ने मिलकर किसानों को धोखा दिया और उनकी जमीन हड़प ली। जमीन अधिग्रहण रद्द करने का फैसला आते ही 25 लाख रुपये एकड़ जमीन की कीमत 80 लाख रुपये हो गई। बाद में डीएलएफ होम डेवलपर्स लिमिटेड ने इसे 4.5 करोड़ रुपये प्रति एकड़ में खरीदा।
बिचौलियों ने प्रति एकड़ साढे़ तीन करोड़ रुपये कमाए
किसानों से मामूली रकम में जमीन खरीदकर डीएलएफ को देने तक बिचौलियों ने आराम से साढ़े तीन करोड़ रुपये प्रति एकड़ का मुनाफा कमाया।
फैसले के प्रमुख बिंदु
-किसानों ने जमीन अपनी मर्जी से बिल्डरों को नहीं बेची उन्हें इसके लिए धोखेबाजी कर उकसाया गया।
-राज्य सरकार ने भूमि अधिग्रहण रोक कर गलत किया, इसे रद्द कर दिया गया।
-किसान जमीन का मुआवजा बढ़ाने की मांग कर सकते हैं।